प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया ) 
नवभारत विशेष

नवभारत संपादकीय: अभी से करें पेयजल संकट का समाधान

Climate Water Crisis: अत्यधिक गर्मी और कमजोर जल प्रबंधन के कारण भारत जल संकट की ओर बढ़ रहा है। लू, सूखा और असमान वर्षा भविष्य की बड़ी चेतावनी हैं।

अंकिता पटेल

India Heat Water Crisis: भारतीय मौसम विभाग ने इस वर्ष सामान्य से अधिक तापमान की आशंका जताई है। ग्लोबल वार्मिंग और एल-नीनो जैसी वैश्विक जलवायु परिस्थितियों के कारण देश के अनेक हिस्सों में लू, सूखा और असमान वर्षा होने का खतरा बढ़ गया है। बढ़ती गर्मी केवल असुविधा का विषय नहीं है, यह सीधे-सीधे पेयजल संकट, कृषि उत्पादन और जनस्वास्थ्य से जुड़ा प्रश्न है।

इसलिए यह समय चेतावनी को गंभीरता से लेने और अभी से ठोस तैयारी करने का है। भारत जल संसाधनों के मामले में परी तरह गरीब देश नहीं है, औसतन 110 सेंटीमीटर वर्षा के साथ हमें हर वर्ष लगभग 4000 घन किलोमीटर पानी घन किलोमीटर पानी प्राप्त होता है।

यह मात्रा दुनिया के अनेक देशों से अधिक है। फिर भी विडंबना यह है कि बरसने वाले कुल पानी का लगभग 85 प्रतिशत समुद्र में बह जाता है और केवल 15 प्रतिशत ही हम संचित कर पाते हैं।

परिणामस्वरूप थोड़ी सी कम बारिश भी जल संकट का रूप ले लेती है। देश के 13 राज्यों के 135 जिलों में करीब दो करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि ऐसे क्षेत्र में आती है जहां हर दस वर्षों में चार बार सूखे जैसी स्थिति बन जाती है। समस्या का मूल कारण केवल कम वर्षा नहीं, बल्कि कमजोर जल प्रबंधन है।

यदि औसत से कुछ कम वर्षा भी हो और हम वर्षा जल संचयन, जल पुनर्भरण और वितरण का वैज्ञानिक प्रबंधन करें, तो संकट की तीव्रता कम की जा सकती है। आज भी देश का बड़ा हिस्सा मानसून पर निर्भर है।

उत्तरी भारत में नदियों का लगभग 80 प्रतिशत जल जून से सितंबर के बीच बहता है, जबकि दक्षिणी राज्यों में यह आंकड़ा 90 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। वर्ष के शेष आठ महीनों के लिए हमारे पास पर्याप्त संग्रहण क्षमता नहीं है इसके अलावा खेती के स्वरूप में आया बदलाव भी चिंता का विषय है।

कम पानी में उगने वाले ज्वार, बाजरा, कोदो, कुटकी जैसे मोटे अनाज का रकबा घटा है, जबकि सोयाबीन, धान और अन्य अधिक पानी मांगने वाली फसलों का विस्तार हुआ है। इससे वर्षा पर निर्भरता बढ़ी है और भूजल दोहन तेज हुआ है। अनेक राज्यों में भूजल स्तर खतरनाक रूप से नीचे जा चुका है। ट्यूबवेल और बोरिंग की सुविधा ने जल उपयोग को आसान ती बनाया, पर संयम की परंपरा को कमजोर किया है।

ग्रामीण भारत में कभी तालाब, बावड़ी, कुएं और छोटी नदियां जल सुरक्षा की मजबूत कड़ी थीं। आज इनमें से अनेक या तो अतिक्रमण की भेंट चढ़ गए हैं या गंदे नालों में बदल चुके हैं। शहरीकरण, अवैज्ञानिक निर्माण और रेत खनन ने नदियों के प्राकृतिक मार्ग को बाधित किया है।

यदि हम पारंपरिक जल स्रोतों का पुनर्जीवन नहीं करेंगे, तो हर गर्मी में टैंकरों और रेल से पानी पहुंचाने की विवशता बनी रहेगी। दरअसल, अब समय आ गया है कि जल प्रबंधन को आपदा प्रबंधन की तरह लिया जाए प्रत्येक शहर और गांव में वर्षा जल संचयन अनिवार्य हो।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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