India Neutral Foreign Policy: भारत की विदेशनीति का बुनियादी आधार शांतिपूर्ण सहअस्तित्व व यथासंभव सभी से मित्रता का रहा है। चाहे रूस-यूक्रेन युद्ध हो या अमेरिका व इजराइल का ईरान पर हमला, भारत ने किसी का पक्ष न लेते हुए यही राय दी कि यह समय युद्ध का नहीं है और यथाशीघ्र शांति स्थापना होनी चाहिए, यह बात ध्यान देने योग्य है कि पाकिस्तान की 900 किलोमीटर लंबी पश्चिमी सीमा ईरान से लगती है और उसके यहां 4 करोड़ शिया मुस्लिमों की आबादी है।
इसलिए उसने 8-10 दिन पहले तुर्किए, सऊदी अरब व मिस्र के विदेश मंत्रियों की बैठक बुलाई और अमेरिका का 15 सूत्री प्रस्ताव ईरान तक पहुंचाया। ईरान का सख्त जवाब भी पाक ने अमेरिका को पहुंचाया।
बाद में चीन भी इन प्रयासों में शामिल हो गया। पाकिस्तान को पूरी तरह सफल इसलिए नहीं माना जा सकता क्योंकि वहां के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की घोषणा के बावजूद इजराइल लेबनान पर हमले कर रहा है और कहता है कि सीजफायर लेबनान के संबंध में नहीं है। यह ट्रंप पर निर्भर है कि वह युद्धविराम को पूरी तरह मानने के लिए नेतन्याहू पर दबाव डालें।
शंति और स्थायित्व जरूरी था, फिर वह चाहे जिसके प्रयास से हो। यह मानना गलत है कि भारत ने संघर्ष विराम के लिए मध्यस्थता नहीं की तो उसका कूटनीतिक कद छोटा हो गया, वास्तव में ट्रंप ने पाकिस्तान को मोहरे के तौर पर इस्तेमाल करते हुए यह दिखाया कि एक तीसरे पक्ष ने अमेरिका व ईरान के बीच तनाव कम कराया।
अमेरिका के पिट्ट के रूप में पाकिस्तान की हमेशा से भूमिका रही है। ट्रंप ने मुनीर को अपना पसंदीदा फील्ड मार्शल कहा था। ऑपरेशन सिंदूर के बाद से पाकिस्तान अमेरिका से कुछ ज्यादा ही चिपक गया।
उसने चापलूसी करते हुए ट्रंप को नोबल शांति पुरस्कार देने की सिफारिश की थी। ट्रंप को सोचना होगा कि वह अब भी हिजबुल्ला पर आक्रमण कर रहे इजराइल का साथ दें या पाकिस्तान की पीठ थपथपाएं, यदि पाकिस्तान की कूटनीतिक सफलता की तारीफ होती है तो भारत को इससे कोई नुकसान नहीं है।
यह 2 सप्ताह का युद्धविराम हुआ है जिसे स्थायी नहीं कहा जा सकता। डोनाल्ड ट्रंप के कदमों का कोई भरोसा नहीं है। यदि उन्हें लगा कि ईरान पूरी तरह झुकने को तैयार नहीं है तो वह फिर लड़ाई छेड़ सकते हैं। वास्तव में इजराइल ने ईरान से लड़ने के लिए चालाकी से ट्रंप का इस्तेमाल किया था।
39 दिन चले इस युद्ध में अमेरिका को व्यर्थ का नुकसान उठाना पड़ा और खाड़ी देशों में उसके हितों को भी क्षति पहुंची, यदि युद्धविराम स्थायी रूप से लागू हो जाए तो भारत को लाभ ही है।
उसे तेल व गैस की सप्लाई सुनिश्चित हो जाएगी तथा इनके दाम भी गिरेंगे। भारत के इजराइल व ईरान दोनों से संबंध पहले के समान अच्छे बने रहेंगे, अमेरिका का प्रयास रहेगा कि पाकिस्तान चीन की बजाय उससे ज्यादा निकटता चढ़ाए।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा