Pali Congress Internal Rift: लंबे अरसे बाद पाली के निकाय चुनाव में जनता ने कांग्रेस के पक्ष में अपना फैसला सुनाया। आंकड़े कांग्रेस के साथ खड़े थे, जनादेश कांग्रेस के साथ था और तस्वीर ऐसी थी कि कांग्रेस के लिए बोर्ड बनाना महज एक औपचारिकता नजर आ रही थी। जो बोर्ड कांग्रेस को बनाना चाहिए था, उसकी चाबी आखिरकार भाजपा के हाथों में पहुंच गई।
पाली की इस पूरी सियासी कहानी को समझिए। यह कहानी है गुटबाजी की, महत्वाकांक्षाओं की, पर्दे के पीछे चलने वाली कवायद की और उन किरदारों की, जिनकी आपसी खींचतान ने कांग्रेस के सामने मौजूद आसान रास्ते को मुश्किल बना दिया। इस पूरे घटनाक्रम में तीन नाम सबसे ज्यादा चर्चा में रहे- प्रदीप हिंगड, हकीम भाई और विधायक भीमराज भाटी।
प्रदीप हिंगड कांग्रेस के पुराने और सक्रिय नेताओं में गिने जाते हैं। लेकिन उनके बारे में पाली की सियासत में एक धारणा लंबे समय से चर्चा में रही है कि अगर पार्टी से टिकट नहीं मिला तो वे निर्दलीय मैदान में उतरने से भी पीछे नहीं हटते। दूसरा नाम है पाली के चर्चित हकीम भाई का और तीसरा नाम है विधायक भीमराज भाटी का।
निकाय चुनाव के लिए कांग्रेस ने हेमसिंह शेखावत को पर्यवेक्षक बनाकर पाली भेजा। पाली पहुंचने के बाद शेखावत पर गोंच की तरह प्रदीप हिंगड, हकीम भाई और भीमराज भाटी चिपक गए और उन्हें अपने पाले में लिया।
उधर भाजपा के दिग्गज नेता ज्ञानचंद पारख और पूर्व चेयरमैन राकेश भाटी की अदावत बढ़ी तो राकेश भाटी भाजपा से बाहर हो गए। उन्होंने कांग्रेस में मौका खोजा। सूत्रों के मुताबिक, राकेश भाटी की कांग्रेस में एंट्री को लेकर पाली के स्थानीय संगठन और जिलाध्यक्ष का इंकार था क्योंकि वहां कांग्रेस लंबे समय से राकेश भाटी के शासन से ही लड़ती आई है।
हालांकि जिलाध्यक्ष को भी पूरी जानकारी नहीं दी गई और राकेश भाटी को सीधे जयपुर बुलाकर कांग्रेस में शामिल कराया गया। आखिर समय में जिलाध्यक्ष भी आनन फानन में पीसीसी पहुंचे और राकेश भाटी की ज्वाइनिंग प्रक्रिया में शामिल हुए।
अब बारी थी पार्षदों के टिकट तय करने की। यहीं से विवाद और गहरा गया। सूत्रों के अनुसार, जिलाध्यक्ष को विश्वास में लिए बिना पर्यवेक्षक हेमसिंह शेखावत, हकीम भाई, प्रदीप हिंगड और विधायक भीमराज भाटी की ओर से टिकटों को लेकर फैसले किए गए। इसी बीच प्रदीप हिंगड की महत्वाकांक्षा भी चर्चा में आ गई। बताया जाता है कि हिंगड चाहते थे कि उनकी पत्नी को बोर्ड अध्यक्ष की दौड़ में आगे किया जाए।
पाली के 65 वार्डों में चुनाव हुआ। कांग्रेस को 29 सीटें मिलीं और एक निर्दलीय पार्षद कांग्रेस समर्थित बताया गया। यानी कांग्रेस के साथ कुल 30 पार्षदों का आंकड़ा खड़ा था। भाजपा के खाते में 20 सीटें आईं। वहीं 15 निर्दलीय पार्षद चुनाव जीतकर आए।
कांग्रेस के पार्षदों को पाली से बाहर ले जाकर ब्यावर के आगे विजयनगर में रखा गया। बाड़ेबंदी भी प्रदीप हिंगड, हकीम भाई और विधायक भीमराज भाटी द्वारा की गई। अब सवाल सिर्फ पार्षदों को सुरक्षित रखने का नहीं था। सवाल था- बोर्ड अध्यक्ष (महापौर) कौन बनेगा? यहीं पर कांग्रेस के भीतर मौजूद महत्वाकांक्षाएं खुलकर सामने आने लगीं।
बताया जाता है कि विधायक भीमराज भाटी ने अपनी ओर से सुमित्रा जैन का नाम चेयरमैन पद के लिए आगे बढ़ाया। इस नाम ने प्रदीप हिंगड खेमे को नाराज़ कर दिया।
सूत्रों के मुताबिक, इसी मुद्दे को लेकर दोनों खेमों में तनाव इतना बढ़ा कि बात नेताओं के घरों तक पहुंच गई। यहां तक कि भीमराज भाटी के भाई और प्रदीप हिंगड के भाई के बीच मारपीट होने की बात भी सामने आई। यानी जिस कांग्रेस को अपने 30 पार्षदों को एक साथ रखकर बोर्ड बनाना था, उसी के भीतर अब चेयरमैन की कुर्सी को लेकर खींचतान शुरू हो चुकी थी।
दरअसल, प्रदीप हिंगड अपनी पत्नी राजबाला को महापौर बनाना चाहते थे तो उन्होंने निर्दलीय पर्चा भी भरवा दिया। अब मुकाबला सिर्फ कांग्रेस बनाम भाजपा नहीं रह गया था। कांग्रेस के भीतर ही कई दावेदारियां खड़ी हो चुकी थीं।
आरोप है कि इसी दौरान पार्षदों को अपने पक्ष में करने के लिए दबाव, प्रलोभन और धनबल का इस्तेमाल किया गया। सूत्रों के हवाले से दुबई ट्रिप, 25 लाख रुपये नकद और 5 लाख रुपये की शॉपिंग जैसी पेशकशों की चर्चा भी सामने आई। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अलग विषय है, लेकिन इतना जरूर हुआ कि कांग्रेस का मजबूत दिख रहा खेमा धीरे-धीरे बिखरने लगा।
और फिर हुई वोटिंग...कांग्रेस की ओर से सुमित्रा जैन मैदान में थीं। उन्हें महज़ 3 वोट मिले। निर्दलीय राजबाला को कुल 29 वोट मिले क्योंकि कांग्रेस के पार्षदों को यह एहसास होने लगा कि खेल बिगड़ जाएगा और भाजपा बोर्ड बना लेगी तो भाजपा को रोकने के लिए कांग्रेस पार्षदों ने राजबाला के पक्ष में मतदान किया।
नतीजा यह हुआ कि राजबाला के पक्ष में कुल 29 वोट चले गए और कांग्रेस की सुमित्रा जैन के हिस्से में सिर्फ 3 वोट रह गए। वहीं, 65 सदस्यीय सदन में भाजपा के पास 20 पार्षद थे। उसे बोर्ड बनाने के लिए निर्दलीयों की जरूरत थी। भाजपा की उम्मीदवार नमिता बुबकिया को भाजपा के 20 और निर्दलीय और क्रॉस मिलकर 13 और वोट मिल गए और 33 के साथ नमिता बुबकिया महापौर बन गईं।
यानी जनता ने कांग्रेस को सबसे बड़ा खेमे के रूप में चुना, लेकिन कांग्रेस अपनी आंतरिक खींचतान के चलते उस जनादेश को सत्ता में तब्दील नहीं कर पाई। तीन चेहरे और एक बिखरी हुई रणनीति। पाली की इस पूरी कहानी में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर कांग्रेस से कहां चूक हुई?
सबसे बड़ी चर्चा हेमसिंह शेखावत के रोल को लेकर भी है क्योंकि सूत्रों के अनुसार उन्होंने पूरी तरह निष्पक्ष होकर संगठन का काम नहीं किया बल्कि तीनों नेताओं के इनफ्लुएंस में आकर अपना काम किया। स्थानीय राजनीतिक हलकों में इसकी अलग-अलग व्याख्याएं हैं। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में बार-बार तीन नाम चर्चा में आते रहे- प्रदीप हिंगड, हकीम भाई और विधायक भीमराज भाटी।
हालांकि, उपमहापौर चुनाव ने कुछ लाज बचाई है। लॉटरी के जरिए निर्दलीय महबूब टी उपमहापौर चुने गए। अगर यहां भी समीकरण भाजपा के पक्ष में जाता, तो पाली में कांग्रेस की मुश्किल और गहरी हो सकती थी।