दहेज हत्या, घरेलू हिंसा,(सोर्स: सोशल मीडिया)  
नवभारत विशेष

नवभारत संपादकीय: दहेज का 'रेट कार्ड', संपन्नता आ गई, शिक्षा आ गई, बस इंसानों के भीतर 'इंसानियत' आना बाकी है!

Dowry Death Cases: दहेज प्रथा आज भी महिलाओं के खिलाफ हिंसा और मौत का बड़ा कारण बनी हुई है। कानून होने के बावजूद हर साल हजारों महिलाएं दहेज प्रताड़ना और मृत्यु का शिकार होती हैं।

अंकिता पटेल

India Dowry Death Crisis: दहेज की वजह से होने वाली मौत समाज व सभ्यता के न लिए चहुत बड़ा कलंक है। यह केवल सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि घरेलू हिंसा का प्रमुख कारण है जिसको परिणत्ति हत्या या आत्महत्या में होती है। 2024 में देश में 5,737 दहेज मृत्यु की घटनाएं हुई। औसत रूप से हर दिन 16 महिलाओं की मौत हुई मुकदमा पूरा होने पर लगभग 35 प्रतिशत मामलों में दोषियों को सजा सुनाई गई। आश्चर्य इस बात का है कि हर प्रकार से संपन्न और सुशिक्षित लोग भी दहेज लेने में पीछे नहीं रहते। कौन सोच सकता था कि ट्विशा शर्मा दहेज मौत के मामले में उसकी सास व पूर्व जज गिरीबाला सिंह की गिरफ्तारी होगी। ट्विशा के शरीर पर फांसी के अलावा सिर, हाथ व उंगली पर चोट के निशान पाए गाए।

इस मामले में दहेज प्रतारणा व क्रूरता के गंभीर आरोप हैं। क्या धनके लोभ में लोग दया, स्नेह, सहनशीलता, उदारता, अपनापन जैसे मानवीय गुणों को भूलकर वहशी दरिंदे बन जाते हैं। ससुराल में बहू अकेली पड़ जाती है, उसका जीवनसाथी कहलाने वाला पति भी उसका साथ देना तो दूर, अत्याचार में शामिल हो जाता है। यह कैसी विडंबना है। भारत में दहेज प्रतिबंधक कानून 1961 से है जो दहेज के लेनदेन को अपराध करार देता है।

दहेज पर सख्त कानून, सख्त अमल जरूरी

भारत न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 80 दहेज मृत्यु से संबंधित है व धारा 85 क्रूरता व सताए जाने के संबंध में है। यह कानूनी प्रावधान तत्परता से अमल में लाए जाने चाहिए, लोगों को समइस्ना चाहिए कि दहेज और खी धन में फर्क है। माता-पिता अपनी बेटी की शादी के समय उनकी वित्तीय सुरक्षा, गरिमा के लिए जो आभूषण या उपहार स्वेच्छा से देते हैं वह उसका स्त्रीधन है जिस पर उसका अधिकार रहता है। दहेज मांगना एक विकृति है और यह मांग शादी के समय और उसके बाद भी लगातार जारी रहती है जैसे कि महंगी कार मांगना, चिजनेस या क्लीनिक शुरू करने के लिए मोटी रकम मांगना।

दहेजलोभियों का सामाजिक बहिष्कार जरूरी

ऐसे दहेजलोभियों का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए, जिस युवक में खुद्दारी या तनिक भी आत्मसम्मान हो वह अपने पुरुषार्थ से धन कमाएगा, ससुराल से दहेज का तकाजा नहीं करेगा। उसे घर बसाने के लिए अधांगिनी मिली है जिसके साथ उसे गरिमापूर्ण व सुखी जीवन बिताना चाहिए न कि उसे अपमानित कर हिंसा का शिकार बनाना चाहिए, यदि बेटी के साथ ससुराल में दुर्व्यवहार हो और बात बनती नजर न आए तो उसे दरिंदों के चंगुल में अकेली व असहाय न छोड़कर तुरंत गरिमापूर्वक मायके ले आना चाहिए, कम से कम उसकी जान तो बचेगी। जो माता-पिता यह मानकर चलते हैं कि हमने कन्यादान कर अपना फर्ज निभा दिवा, आगे लड़की की किस्मत, उन्हें समझना चाहिए कि बेटी कभी पराई नहीं होती। उसे मुसीबत से बचाना माता-पिता का फर्ज है। वह शिक्षित है तो अपने पैरों पर खड़ी हो सकती है।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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