Congress Regional Parties Strategy: अभी से यह मान लेना अपरिपक्व होगा कि टीएमसी व अ शरद पवार की राकांपा का कांग्रेस में विलय होगा। उनके बीच तालमेल अवश्य गहरा हो सकता है। 2024 के लोकसभा चुनाव के समय ही पवार ने भविष्यवाणी की थी कि 2 वर्षों के भीतर अनेक क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस को निकटता से सहयोग देने लगेंगी या उसमें विलय कर लेंगी। हाल ही में उन्होंने फिर कहा कि कांग्रेस और राकांपा के उद्देश्यों में कोई खास फर्क नहीं है।
राकांपा भी गांधी-नेहरू की विरासत को मानने वाली सेक्युलर पार्टी है। वास्तव में लोकसभा चुनाव में 99 सीटें हासिल करने के बाद कांग्रेस ने किसी क्षेत्रीय पार्टी के नेता से निकट सहयोग को लेकर चर्चा नहीं की। यदि वह ऐसा करती तो हरियाणा, महाराष्ट्र व दिल्ली में उसका अनुकूल नतीजा निकल सकता था और बीजेपी को भी इन राज्यों में इतनी सफलता न मिलती। इस समय बीजेपी तेजी से अपना विस्तार कर रही है।
बिहार, बंगाल पूरी तरह उसके कब्जे में आ गए हैं और क्षेत्रीय पार्टियां बुरी तरह ध्वस्त होती जा रही हैं। विपक्षी दलों में फूट डालकर बीजेपी संसद में दो-तिहाई बहुमत की ओर बढ़ रही है। ममता बनर्जी की पार्टी के दो-तिहाई सांसद उनका साथ छोड़कर एनसीपीआई नामक छोटी और अज्ञात पार्टी में शामिल हो गए ताकि उन पर दलबदल विरोधी कानून की आंच न आने पाए। बीजेपी संसद में दो तिहाई बहुमत से परिसीमन विधेयक पारित करना व महिला आरक्षण कानून लागू करवाना चाहती है। इसके लिए उसके नेताओं ने डीएमके से बात की है। कांग्रेस द्वारा अभिनेता जोसेफ विजय की पार्टी टीवीके को समर्थन देने की वजह से डीएमके नाराज है।
बीजेपी इसका लाभ उठाना चाहती है। डीएमके के 22 लोकसभा सदस्य हैं। इन सारी परिस्थितियों को देखते हुए कांग्रेस ने गत 8 जून को इंडिया गठबंधन की बैठक बुलाई जिसमें ममता, सोनिया गांधी के गले मिलीं। इसके बाद यह चर्चा शुरू हो गई कि ममता और पवार अपनी पार्टियों का कांग्रेस में विलय कर सकते हैं। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी उन सारे नेताओं व पार्टियों को घरवापसी करने का आवाहन किया जो पहले कांग्रेस में थे।
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आंध्र प्रदेश में जगनमोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस 2010 में कांग्रेस पार्टी से अलग हुई। मुद्दा यह उठता है कि क्या ममता बनर्जी या शरद पवार जैसे सीनियर नेता कांग्रेस में राहुल गांधी के नेतृत्व में रहना पसंद करेंगे? संभवतः वह बुजुर्ग नेता मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ काम करने को तैयार हो सकते हैं। ममता बनर्जी 1998 में कांग्रेस से अलग हुई थीं। 1999 में पवार ने कांग्रेस छोड़ी थी। यदि इन पार्टियों का कांग्रेस में विलय नहीं होता तो भी आपसी निकट सहयोग की दिशा में उनके कदम बढ़ सकते हैं। यदि ऐसी निकटता नहीं हो पाई तो बीजेपी के सामने क्षेत्रीय दल अपना अस्तित्व नहीं बचा पाएंगे।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा