OBC Population Data Census: जनगणना के द्वितीय चरण में केंद्र सरकार द्वारा जारी प्रश्नावली में जातियों के अनुसार गणना का समावेश है, लेकिन ओबीसी के लिए अलग या स्वतंत्र कॉलम शामिल नहीं किया गया। इस वजह से ओबीसी की वास्तविक संख्या और सामाजिक स्थिति सामने नहीं आएगी। इससे देश के इस बड़े वर्ग की दिक्कतें भविष्य में और बढ़ सकती हैं। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कितनी ही बार स्वयं को ओबीसी का बताया।
केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह सहित अनेक बीजेपी नेताओं ने आश्वासन दिए थे कि ओबीसी प्रवर्ग की स्वतंत्र गणना होगी, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। किसी भी वर्ग को शैक्षणिक, आर्थिक या राजनीतिक लाभदेना हो तो उसकी जनसंख्या कितनी है, यह देखना पड़ता है। आज तक ऐसा नहीं होने की वजह से मंडल आयोग की सिफारिश के अनुसार 27 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान होने पर भी यह वर्ग अनेक प्रकार के लाभ से वंचित रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) का इंपीरिकल डाटा (सांख्यिकी जानकारी) बार-बार मांगने पर भी अब तक नहीं दिया गया। सरकार की दलील थी कि यूपीए शासन के दौरान 2011 में की गई जनगणना में जातिनिहाय गणना की जानकारी अचूक नहीं है। अब यह सरकार भी उसी रास्ते पर जा रही है। ऐसी शंका है कि बीजेपी ओबीसी हिंदुओं में से अल्पसंख्यक जातियों को अपने निकट लाने की कोशिश कर रही है। उत्तर प्रदेश में उसने यही नीति अपनाई। आज तक जिन जातियों को आरक्षण का लाभ मिला उन्हें अलग रखकर जिन जातियों को कम लाभ मिला, उन्हें पास लाने की उसकी रणनीति है। अनुसूचित जाति-जमाति के प्रवर्ग में भी न्यायालय के आदेशानुसार उपवर्गीकरण करना होगा।
ऐसी ही बात भविष्य में ओबीसी के साथ हो सकती है। इसके लिए अब तक घोषित नहीं की गई रोहिणी आयोग की रिपोर्ट का आधार लिया जा सकता है। यदि ऐसा हुआ तो राजनीतिक आरक्षण के लिए झगड़ रहे ओबीसी में अंतर्कलह शुरू हो सकता है। जाति के अनुसार जनगणना की जानकारी सरकार के पास आने के बाद कौन अगड़ा और कौन पिछड़ा है, यह सहजता से सिद्ध किया जा सकेगा।
यह जानकारी सार्वजनिक होने पर प्रवर्ग की संकल्पना पीछे रह जाएगी और जाति के अनुसार झगड़े शुरू हो जाएंगे। क्या सत्ताधीशों को यही चाहिए? दूसरा मुद्दा बीजेपी की हिंदुत्व की राजनीति से जुड़ा है। ओबीसी की अधिकांश जातियां हिंदू हैं। इसलिए उन्हें धर्म के नाम पर एकजुट करने की राजनीति पहले से चली आ रही है। बार-बार कहा जाता है कि जाति को भूलो और धर्म के नाम पर संगठित हो जाओ।
ओबीसी कॉलम रखे जाने पर आरक्षण के मुद्दे पर यह वर्ग एकजुट हो जाता। ऐसा होने पर धर्म के आधार पर सत्ता पाने वालों के लिए खतरे की घंटी बज जाती। लगता है, इसलिए जातिनिहाय जनगणना में ओबीसी का कॉलम नहीं रखा गया। ओबीसी को अलग रखकर की गई जनगणना भविष्य में अनेक दिक्कतें पैदा करेगी। राजनीतिक आरक्षण से लेकर योजनाओं के लाभतक हर मुद्दे के लिए इस वर्ग को आंदोलन करना पड़ेगा।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा