Bombay HC Free Speech: न्यायाधीश जामदार ने सईद अहमद के खिलाफ जारी किए गए दोनों आदेशों को निरस्त करते हुए कहा कि सरकारों के खिलाफ शांतिपूर्ण मोर्चा या धरना देना महाराष्ट्र पुलिस एक्ट के तहत निष्कासन का आधार नहीं हो सकते। अदालत ने कहा कि आदेश दुर्भावना से प्रेरित थे और याचिकाकर्ता के जो अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19 व 21 के तहत हैं, उन्हें प्रभावित करते हैं।
अदालत ने यह भी कहा कि नागरिकों के पास अपनी राय को आजादी के साथ व्यक्त करने और सम्मान के साथ जीवन व्यतीत करने का अधिकार है। अदालत ने कहा है कि सरकार की नीतियों का विरोध करना आपराधिक मामला नहीं है। नागरिक 'सरकार के गुलाम' नहीं हैं।
सरकार वैध लोकतांत्रिक असहमति को कुचल नहीं सकती या राजनीतिक विरोध को शांत करने के लिए असाधारण रोकथाम के उपाय लागू नहीं कर सकती, जैसे निष्कासन, तीसरा यह कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 व 21 के तहत जो अधिकार हैं, उनका उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि नागरिक की अभिव्यक्ति की आजादी और सम्मान के साथ जीवन व्यतीत करने के अधिकार को इस आधार पर छीना नहीं जा सकता कि राज्य की नीतियों से कोई शांतिपूर्ण तरीके से असहमत है।
अदालत ने कानून लागू करने वाली एजेंसीज, जैसे पुलिस को याद दिलाया कि उनकी संवैधानिक जिम्मेदारी कानून को बरकरार रखने व जनसेवा की है, न कि राजनीतिक आकाओं के नौकरों की तरह हरकत करने की। अदालत ने राज्य की राजनीतिक स्थिति पर मौखिक टिप्पणी करते हुए सांसदों व विधायकों द्वारा दल-बदल का भी जिक्र किया और 'हॉर्स ट्रेडिंग' व 'वॉशिंग मशीन' जैसे शब्दों का प्रयोग किया।
न्यायाधीश ने कहा कि एक सियासी नेता अपने खिलाफ आपराधिक मामलों को बंद करा सकता है, जिसके लिए उसे सिर्फ 'वॉशिंग मशीन' यानी सत्तारूढ़ को जॉइन करना है। असहमति व शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र के स्तंभ हैं। बिना असहमति के अधिकार के लोकतंत्र की कल्पना भी नहीं की जा सकती और असहमति का अधिकार 5 साल पर मिलने वाली रियायत नहीं है, जो केवल मतदान के दिन उपलब्ध होती है।
भारत स्वतंत्र राष्ट्र केवल इसलिए बन सका क्योंकि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नेतृत्व में वह निरंतरता से अहिंसा आधारित विरोध प्रदर्शन करता रहा। हमारे जनजीवन में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को अधिक सम्मान मिलना चाहिए।
असहमति व्यक्त करने वालों का पुलिसिया दमन निश्चितरूप से निंदनीय व परेशान करने वाला है, लेकिन चिंता का असल कारण यह है कि कोई भी राजनीतिक दल न तो इसमें सुधार लाने का इच्छुक है और न ही प्रयास कर रहा है। राज्य सरकारें पुलिस का इस्तेमाल अपने व्यक्तिगत सुरक्षा गार्डस् की तरह करती हैं और अपनी मनमर्जी का काम कराती हैं।
ध्यान रहे कि सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में पुलिस सुधार संबंधी दिशा-निर्देश जारी किए थे, लेकिन पूरी तरह से उन्हें किसी भी राज्य ने लागू नहीं किया है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन सभ्य समाज का महत्वपूर्ण औजार है, जिसका अधिक से अधिक इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) के महासचिव सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी भारत सरकार के कुछ निर्णयों का शांतिपूर्ण विरोध करते हुए मोर्चा व धरनों का आयोजन कर रहे थे।
यह बात महाराष्ट्र सरकार को पसंद नहीं आई और 3 दिसंबर 2025 व 27 मार्च 2026 को पुलिस ने उनके खिलाफ मुंबई शहर व उसके आसपास के क्षेत्रों से एक वर्ष के लिए शहर बदर (निष्कासन) के आदेश दिए। सईद अहमद ने इन आदेशों को अदालत में चुनौती दी, जिस पर 3 जुलाई को बॉम्बे हाईकोट के न्यायाधीश माधव जामदार ने ऐसा ऐतिहासिक निर्णय सुनाया, जो न केवल लोकतंत्र में नागरिकों की आस्था को मजबूत करता है व वर्तमान राजनीति को भी आईना दिखाता है।
लेख-शाहिद ए चौधरी के द्वारा