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नवभारत विशेष: SIR पर बॉम्बे हाईकोर्ट की फटकार, कहा- कानून चलेगा या सॉफ्टवेयर?

SIR Voter Revision: गोवा में SIR प्रक्रिया को लेकर बॉम्बे HC ने चुनाव आयोग पर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि सॉफ्टवेयर कानूनी प्रक्रिया पर हावी नहीं हो सकता व बिना सुनवाई मतदाता का नाम नहीं हटाया जा सकता।

अंकिता पटेल

SIR Voter List Removal: बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच ने चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया पर कड़ी टिप्पणी की और फटकार लगाते हुए कहा कि व्यवस्था को संवैधानिक कानूनों का पालन करना चाहिए न कि सॉफ्टवेयर तर्क का।

न्यायाधीश वाल्मीकि मॅजीज और न्यायाधीश अमित जामसांडेकर की खंडपीठ ने कहा कि एसआईआर प्रोटोकॉल स्थापित कानूनी प्रक्रियाओं को स्थगित कर रहा है जैसे जनप्रतिनिधि कानून की धारा 22 को और ऐसा प्रतीत होता है कि सिस्टम 'कानून का नहीं बल्कि सॉफ्टवेयर का पालन' कराना चाहता है।

इसलिए अदालत ने सवाल किया कि एसआईआर प्रक्रिया के दौरान ईसीआई का सॉफ्टवेयर स्वतः ही फॉर्म 8 की अर्जियों को क्यों ठुकरा रहा है, जिनका संबंध मतदाता का पता बदलने से है? अदालत ने कहा कि बिना उचित सुनवाई या कानूनी प्रक्रिया का पालन किये किसी का नाम भी मतदाता सूची से हटाया नहीं जा सकता।

अदालत की यह टिप्पणी सांताक्रूज विधानसभा क्षेत्र से एक स्थानीय परिवार का नाम मतदाता सूची से हटाए जाने के संदर्भ में थी, जबकि उसने अपना पता बदलने के लिए फॉर्म 8 सही से भरा था।

चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल

चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर 14 प्रश्न उठाये गए थे, खासकर यह कि किस तरह मनमाने ढंग से मतदाता सूचियों में नाम घटाये या बढ़ाये जा रहे हैं और ईआरओ (इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर) की भूमिका को नगण्य बना दिया गया है। इसके अतिरिक्त सुप्रीम कोर्ट के कुछ आदेश भी चौंका देने वाले रहे, मसलन बंगाल में वोटर लिस्ट से हटाये गए लगभग 27 लाख मतदाताओं के बारे में उसने कहा कि वह अगली बार मतदान कर सकते हैं।

फिर उपचुनाव में 18,000 मतदाताओं के अधिकार के बारे में भी उसने कहा कि 'यह सिर्फ उपचुनाव ही तो है' और इन वोटर्स को फ़लिहाल के लिए उनके संवैधानिक अधिकार के प्रयोग से रोक दिया गया।

विपक्षी दलों और दबाव गुट कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) को लगता है कि चुनाव आयोग, विशेषकर उसके प्रमुख ज्ञानेश कुमार, सत्तारूढ़ दल को चुनाव जिताने में सहयोग कर रहे हैं।

2023 में विपक्ष के लगभग 150 सांसदों को संसद से बाहर निकालकर चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में संशोधन किया गया कि यह नियुक्ति प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता व एक कैबिनेट मंत्री की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा की जायेगी।

CEC के इस्तीफे से बैलेट पेपर तक मांग

पहले इस उच्चस्तरीय चयन समिति में प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त कैबिनेट मंत्री की जगह भारत के मुख्य न्यायाधीश थे। इससे हुआ यह कि सरकार अपनी पसंद का चुनाव आयुक्त नियुक्त कर लेगी। दूसरा यह कि चुनाव आयुक्त पर उसके गलत फैसलों के बावजूद भी आपराधिक या दीवानी मुकदमा नहीं चलाया जा सकता यानी उसे कानूनी इम्यूनिटी प्रदान कर दी गई है, जिससे उसे मनमर्जी करने का अवसर मिल जाता है।

तीसरा चुनाव आयोग में आईटी की महानिदेशक सीमा खन्ना, जिनके तहत ईसीआईनेट भी आता है, की भूमिका को लेकर भी जबरदस्त विवाद है, उनकी अनुमति के बिना ईआरओ भी किसी का नाम मतदाता सूची में पंजीकृत नहीं कर सकते, जबकि उनका काम ही यही है।

इन सब बातों की वजह से विपक्षी दलों, सिविल सोसाइटी, सीजेपी आदि विभिन्न संगठनों ने गांधी जयंती पर विशेषरूप से दिल्ली के जंतर-मंतर पर मुंबई के शिवाजी पार्क में विरोध प्रदर्शन किया। इनकी मांगों में यह भी शामिल है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार अपने पद से इस्तीफा दें, जिन 13 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम एसआईआर में हटाए गए हैं, उन्हें वापस वोटर लिस्ट में जोड़ा जाये, मतदान ईवीएम की जगह बैलट पेपर से कराया जाए।

लेख- शाहिद ए चौधरी के द्वारा

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