विधानपरिषद चुनाव में एनडीए की बढ़त के बावजूद विपक्ष ने कई सीटों पर जीत दर्ज की।
यूपी में सपा ने 11 में से 5 सीटें जीतकर अपनी ताकत दिखाई।
वाराणसी, पटना और नागपुर में बीजेपी की हार को पार्टी के लिए झटका बताया गया है।
नतीजों से बीजेपी के लिए जमीनी स्तर पर संगठन मजबूत करने का संदेश सामने आया है।
BJP in Legislative Council Elections: विधानपरिषद चुनाव के नतीजों ने इस भ्रम को चकनाचूर कर दिया कि बीजेपी अजेय है और विपक्ष उसके सामने पानी मांगता है। 4 राज्यों की 28 विधानपरिषद सीटों के चुनाव में यद्यपि बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन ने बढ़त बनाई, लेकिन यह भी स्पष्ट हो गया कि विपक्ष को चुका हुआ कारतूस मानकर खारिज नहीं किया जा सकता।
यह नतीजे बीजेपी को सचेत करते हैं कि सिर्फ मोदी-शाह के नाम पर वोट नहीं मिल सकते। पार्टी कार्यकर्ताओं को जमीनी स्तर पर संगठित रूप से काम करने की आवश्यकता है। यूपी में फरवरी-मार्च में विधानसभा चुनाव होंगे, जिसमें समाजवादी पार्टी की ओर से बीजेपी को कड़ी टक्कर मिल सकती है। अभी प्रदेश की 11 में सकती है। अभी प्रदेश की 11 में से 5 विधानपरिषद सीटों पर सपा ने सफलता हासिल की।
यह कम आधातकारी नहीं है कि प्रधानमंत्री मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में बीजेपी विधानपरिषद चुनाव हार गई। इसी तरह बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के पटना शहर में पार्टी प्रत्याशी की पराजय हुई। एक प्रकार से उनके लिए यह दोहरा झटका है। क्योंकि जिस बांकीपुर सीट से नितिन नवीन विधायक थे और जहां से उनके पिता भी चुनाव जीता करते थे, विधानसभा चुनाव में वह सीट जनसुराज पार्टी के प्रशांत किशोर ने जीत ली थी, बीजेपी को तीसरा बड़ा आघात आरएसएस के मुख्यालय नागपुर में लगा। यह केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का गृहनगर है इसलिए बीजेपी स्वाभाविक रूप से इस सीट को जीतने के लिए प्रयत्नशील थी।
स्नातक मतदाता चुनाव क्षेत्र की नागपुर सीट पर इस बार भी कांग्रेस के प्रत्याशी अभिजीत वंजारी विजयी हुए। उन्हेंनि पिछली बार बीजेपी के संदीप जोशी को हराया था तो इस बार बीजेपी उम्मीदवार सुधाकर कोहले को पछाड़ा, नागपुर की इस सीट पर उम्मीदवारी को लेकर टकराव चल रहा था।
अनिल सोले की बजाय पार्टी ने सुधाकर कोहले को प्रत्याशी बनाया। सगइहने-बुझाने और पार्टी अनुशासन को देखते हुए सोले ने अपनी दावेदारी वापस ले ली थी लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। मतपत्रिका पर उनका भी नाम था। बीजेपी में संघ का अनुशासन है इसलिए सोले और उनके प्रबल समर्थक गिरीश व्यास ने सुधाकर कोहले को सहयोग देना स्वीकार किया।
कोहले की हार के बाद कुछ लोग सोच रहे होंगे कि यदि अनुभवी अनिल सोले को मौका दिया जाता तो शायद बीजेपी यह सीट जीत लेती। यह सिर्फ एक अनुमान ही है। अपने व्यापक जनसंपर्क और लोकप्रियता की बदौलत अभिजीत वंजारी ने दूसरी बार यह सीट जीती। नागपुर के अलावा पुणे स्नातक सीट पर भी महायुति प्रत्याशी ने बीजेपी उम्मीदवार को हराया।
इससे प्रश्न उठता है कि क्या स्नातक मतदाताओं का रजिस्ट्रेशन करने और उन्हें अपने पक्ष में मोबिलाइज करने में बीजेपी और संघ कार्यकर्ता पीछे रह गए? बीजेपी के लिए संतोष की बात है कि उसने व सहयोगी पार्टी जदसे ने कांग्रेस शासित राज्य कर्नाटक में सभी 4 विधानपरिषद सीटों पर विजय हासिल की और इस तरह कांग्रेस को बैकफुट पर ला दिया। कर्नाटक में कठीस अपनी बेफिक्री और आत्ममुग्धता की वजह से हारी।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा