Bhagwat Katha Dakshina Row: पड़ोसी ने हमसे कहा, 'निशानेबाज, खबर है कि छत्तीसगढ़ के पर्यटन मंत्री राजेश अग्रवाल ने अपने यहां भागवत कथा का आयोजन तो करवा लिया लेकिन इसके बाद कथावाचक रामानुरागी महाराज को दक्षिणा नहीं दी। जब वह पैसे मांगने जाते हैं उन्हें धक्के मारकर भगा दिया जाता है। इससे दुखी होकर रामानुरागी महाराज विधानसभा के सामने धरने पर बैठ गए, उन्होंने सरकार और प्रशासन से उचित कार्रवाई की मांग की है और न्याय नहीं मिलने पर आत्मदाह की धमकी दी है।'
हमने कहा, 'जब उनका नाम रामानुरागी है तो भगवान राम के प्रति अनुराग या प्रेम बनाए रखें। दक्षिणा की रकम को लेकर इतना मोह क्यों होना चाहिए? भागवत कथा तो ज्ञान, वैराग्य और भक्ति की सीख देती है। उसे महाराज खुद जीवन में उतारें। जो मिल गया वह हरि इच्छा, जो नहीं मिला उसे भूल जाएं। शुकदेव ने राजा परीक्षित को भागवत कथा सुनाने पर कोई दक्षिणा नहीं ली थी। उस कथा को सुनकर परीक्षित का मृत्यु भय दूर हो गया और वह सांसारिक बंधन से मुक्त हो गए,'
पड़ोसी ने कहा, 'निशानेबाज, किसी भी धार्मिक आयोजन के बाद दक्षिणा देनी ही चाहिए अन्यथा मनोरथ सफल नहीं होता। कथा सुनने के बाद दक्षिणा देना मंत्री का कर्तव्य था। दक्षिणा का सिस्टम द्रोणाचार्य ने बनाया था। उन्होंने दक्षिणा में एकलव्य का अंगूठा मांग लिया था तब एकलव्य ने तुरंत अंगूठा काटकर गुरु को दे दिया था। प्रेमपूर्वक और यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिए।'
हमने कहा, 'यह समय आज नगद कल उधार का है, पंडित को एडवांस में रकम ले लेनी चाहिए थी, क्योंकि मंत्री के वादे या आश्वासन का कोई भरोसा नहीं रहता, त्याग, वैराग्य की सीख देने वाले किसी नामी कथावाचक के पास जाकर पूछो कि महाराज भागवत कथा करानी है तो वह पूछेगा कि यजमान, आपका बजट कितने लाख का है? पंडाल कैसा रहेगा। मंच की सजावट कैसी होगी? कितने लोग सुनने आएंगे? चढ़ावा कितना आएगा? क्या टीवी चैनल पर प्रसारण की व्यवस्था की है? आप इस आयोजन से कितना कमाओगे? हमारी भजन मंडली और हमें कितनी रकम मिलेगी? चलिए एडवांस निकालिए फिर आपको तारीख देंगे। यह कलियुग की कथा है। इसमें आप भी कमाइए, हम भी कमाएंगे!'
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा