एशिया आर्थिक संकट, ईंधन आपूर्ति,(सोर्स: सोशल मीडिया) 
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नवभारत विशेष: सिर्फ भारत नहीं, पूरा एशिया आर्थिक संकट में, जंग की आशंका फिर बढ़ी

Middle East War Impact: एशिया में संभावित युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव से आर्थिक अस्थिरता और ईंधन संकट की आशंका जताई जा रही है। विशेषज्ञ इसे वैश्विक सप्लाई चेन के लिए बड़ा जोखिम मान रहे हैं।

अंकिता पटेल

Asia Fuel Economic Crisis: अगर जंग हुए बिना नहीं रही, तो इस युद्ध के नतीजे कुछ भी हों, लेकिन एशिया के कई देशों में भयानक आर्थिक अशांति पैदा हो सकती है। उसी तरह की जैसे 2022 में श्रीलंका में पैदा हुई थी, जिसके कारण वहां की सरकार गिर गई थी। संभव है कि प्रधानमंत्री देशवासियों से पेट्रोल, गैस, ईंधन के इस्तेमाल पर अंकुश लगाने, घर से काम करने और विदेश यात्राओं में कटौती के साथ लोगों से सोना न खरीदने जैसी अपील जल्द ही फिर दोहराएं, एक पखवाड़े के भीतर ही ईरान और अमेरिका के बीच फिर से बन रही बुद्ध की स्थितियां, खाड़ी में ओमान, संयुक्त अरब अमीरात जैसे कई देशों तक युद्ध पसरने की बढ़ती आशंकाओं ने यह साबित कर दिया कि उनका कथन कितना दूरदर्शितापूर्ण था।

प्रधानमंत्री जैसी ही अपील कई एशियाई देशों के प्रधानमंत्री पहले ही कर चुके हैं। अब भारत भी उन देशों में से शामिल हो गया है, जो लोगों से अपने खचों में कटौती करने, आने वाली परिस्थितियों से संघर्ष करने के लिए उन्हें कमर कसने का आग्रह कर रहे हैं। सभी विकासशील एशियाई देशों में इंधन की आपूर्ति खत्म होने की कगार पर है। इंडोनेशिया के पास तीन हफ्तों से ज्यादा का ईंधन भंडार नहीं बचा है।

वियतनाम के पास तो अब एक महीने से भी कम का भंडार है। पाकिस्तान और बांग्लादेश के लोग जो खाड़ी देशों से आने वाली प्राकृतिक गैस पर निर्भर हैं, वहां त्राहिमाम मचा है। वे लोग लंबे-लंबे ब्लैकआउट की समस्या झेल रहे हैं। इंडोनेशिया एनजीं सब्सिडी पर हर दिन लगभग 6 हजार डॉलर खर्च कर रहा है। भारत को ईंधन की कीमतें स्थिर रखने के लिए हर दिन करोड़ों रूपए खर्च करने पड़ रहे हैं, ऊपर से बुआई के मौसम में खाद पर सब्सिडी देने के लिए कई अरब रुपए खर्चने होंगे। वॉशिंगटन के थिंक टैंक सेंटर फॉर ग्लोबल डेवलपमेंट के अनुसार, क्रूड ऑयल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल पर स्थिर रखने से एशियाई सरकारों को हर साल सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 1 प्रतिशत खर्च करना पड़ेगा। कुछ ही एशियाई देश ऐसा कर सकते हैं।

डीजल और खाद की कमी के चलते पाकिस्तान, बांग्लादेश और इंडोनेशिया के किसान चिंतित हैं। यूरिया जो ज्यादातर खाड़ी देशों में बनता है, उसकी कीमत युद्ध शुरू होने के बाद से 50 फीसद बढ़ गई है। लाखों किसान लागत के कारण धान बोने से कतरा रहे हैं। फिलीपोंस में इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट ने कहा है, 'अभी धान की खेती घाटे का सौदा हो सकती है।' युद्ध जारी रहा, तो यह खाद्य सुरक्षा की समस्या बनेगा। कई एशियाई देश बायोफ्यूल का ज्यादा इस्तेमाल करने की ओर बढ़ रहे हैं।

ऑस्ट्रेलिया, जी कोयले और प्राकृतिक गैस का एक बड़ा निर्यातक है, अपने प्राकृतिक संसाधनों का ज्यादा निर्यात करने के बदले में रिफाइंड ईंधन की खरीद बढ़ा रहा है। उसने बुनेई, जापान, मलेशिया, सिंगापुर और दक्षिण कोरिया के साथ नए सौदे किए हैं। दुनिया में कच्चे तेल का सबसे बड़ा आयातक होने के बावजूद चीन के पास तेल का विशाल भंडार है, जिसे यह सुरक्षा और कूटनीतिक ताकत के लिए इस्तेमाल कर सकता है। संयुक्त राष्ट्र का मानना है कि लड़ाई छिड़ी, लंबी चली तो दक्षिण एशिया की जीडीपी में 3.6 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। जर्मनी का थिंक टैंक, केल इंस्टीट्यूट कहता है, इस साल भारत, पाकिस्तान और श्रीलंका में खाने-पीने की चीजों की कीमतों में बड़ौतरी 10 प्रतिशत से ऊपर जा सकती है।

जंग की आशंका फिर बढ़ी

भारत ही नहीं एशिया के कई देश अपने देशवासियों से प्रधानमंत्री मोदी जैसी अपील कर चुके हैं। चूंकि अब जब शांति समझौता वेंटीलेटर पर है, अगर प्रेसिडेंट ट्रंप की मानें तो उन्होंने मध्य पूर्व के तीन देशों के कहने पर ईरान पर हमला नहीं किया, नहीं तो इस समय तक ईरान दूसरी बार अमेरिका के हमले झेल रहा होता। लेकिन ट्रंप के मुताबिक वह देर तक नहीं रुकेंगे, अगर ईरान नहीं माना तो वह उसे बर्बाद कर देंगे। कहने का मतलब यह है कि जंग की आशंकाएं फिर बढ़ गई है।

लेख- संजय श्रीवास्तव के द्वारा

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