अरविंद केजरीवाल (सोर्स: सोशल मीडिया) 
नवभारत विशेष

नवभारत संपादकीय: दिल्ली शराब घोटाले में केजरीवाल की दलीलों पर विचार आवश्यक

Arvind Kejriwal News: शराब घोटाले में अरविंद केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की बेंच पर सवाल उठाए हैं। हितों के टकराव और एकपक्षीय सुनवाई जैसे गंभीर आरोपों के साथ अब यह मामला नया मोड़ ले चुका है।

आकाश मसने

Arvind Kejriwal Delhi Excise Policy Case: जब केंद्र में केंद्र में यूपीए की सरकार थी तब सीबीआई को पिंजरे का तोता कहा गया था लेकिन एनडीए की सत्ता आने पर भी विशेष अंतर नहीं आया है। हाल ही में शराब आबकारी घोटाले के मामले में विशेष अदालत ने दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया सहित 11 आरोपियों को निर्दोष बरी करते हुए सीबीआई को कड़ी फटकार सुनाई। सीबीआई सबूतों सहित आरोपों को सिद्ध करने में विफल रही। यह मामला पूरी तरह अविश्वसनीय था। अब इस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल की गई है। यह मामला जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के सामने आया है।

केजरीवाल ने मांग की है कि इस मामले की सुनवाई किसी अन्य जज को सौंपी जाए, इस संबंध में केजरीवाल ने वकील की बजाय खुद ही मामला रखा। उन्होंने कहा कि अधिवक्ता परिषद के कार्यक्रम में न्या. शर्मा अनेक बार उपस्थित रहीं और यह संस्था संघ परिवार की है। ऐसा लगता नहीं कि संघ के विचारों से जुड़ा व्यक्ति हमें न्याय देगा। केजरीवाल को इस दलील में इसलिए दम नहीं है क्योंकि किसी संस्था के कार्यक्रम में शामिल होने का अर्थ उसका वैचारिक अनुयायी बनना नहीं होता। जब केजरीवाल ने अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में भाग लिया था तब भी तो संघ परिवार के लोग उनके साथ थे।

अरविंद केजरीवाल की दूसरी दलील है कि न्यायमूर्ति शर्मा के 2 बेटे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के मातहत काम करते हैं। यह हितों के टकराव या कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट का मामला है। केजरीवाल ने एक और महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की पहली सुनवाई के दौरान 23 में से एक भी आरोपी हाजिर नहीं था। तब केवल सीबीआई की उपस्थिति में जस्टिस शर्मा ने सत्र न्यायालय के आदेश को गलत ठहराया। केजरीवाल ने प्रश्न किया कि दोनों पक्षों को सुने बिना न्यायालय ऐसे निष्कर्ष पर कैसे पहुंचा? गत 1 मार्च को सीबीआई की याचिका पर केंद्र सरकार और सीबीआई की कोई भी प्रार्थना या आवेदन नहीं रहने पर भी सुनवाई को स्टे दिया।

कानून के अनुसार मुख्य मामले में आरोप सिद्ध नहीं होने से ईडी का मामला अपनेआप कमजोर हो जाता है। सत्र न्यायालय ने सीबीआई के केस में फैसला दे दिया था इसलिए ईडी का मामला खत्म होने की संभावना थी। न्या। शर्मा ने खुद ही उस पर स्थगनादेश दिया। 600 पृष्ठों के विस्तृत आदेश व सीबीआई की अपील पर केवल एक सप्ताह में उत्तर देने की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

केजरीवाल ने यह कहा कि न्या। शर्मा ने सीबीआई व ईडी की दलील को माना तथा सॉलिसिटर जनरल मेहता की मौखिक दलील पर तत्काल सहमति दर्शाई, केजरीवाल व उनके सहयोगी शराब घोटाले में दोषी हैं या नहीं यह बात सुनवाई के अंत में सामने आएगी लेकिन राजनेताओं के मामले जिस तरीके से अदालत में चलाए जाते हैं व जांच एजेंसियां किस तरह की कार्यपद्धति अपनाती हैं, यह बात लोकतंत्र के लिहाज से महत्व रखती है।

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