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नवभारत संपादकीय: सरकारी अस्पताल या मौत का ठिकाना? अमरावती में वेंटिलेटर की आग ने छीनी 3 मासूमों की सांसें

Amravati Hospital Fire: अमरावती के जिला महिला अस्पताल में वेंटिलेटर में आग लगने से 3 नवजात शिशुओं की दुखद मौत हो गई। अस्पतालों में लगातार हो रहे ऐसे हादसों को रोकने के लिए सख्त सुरक्षा जांच जरूरी है।

अनन्या तिवारी

Amravati Civil Hospital Infant Deaths: अमरावती के शासकीय जिला महिला अस्पताल में वेंटिलेटर की आग से 3 नवजात शिशुओं की मौत हृदयविदारक है। जिन माताओं की गोद हरी होते ही उजड़ गई, वह अपने कलेजे के टुकड़े को खो बैठीं। उनकी मानसिक पीड़ा व आघात के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या सुरक्षित प्रसव के लिए सरकारी अस्पताल में भर्ती होना गुनाह है? समय पूर्व जन्म लेने वाले शिशु को इन्क्यूबेटर में रखा जाता है। लेकिन इन्क्यूबेटर और वेंटिलेटर आग का गोला बन जाए तो इसकी जिम्मेदारी किस पर है? यह अव्यवस्था और लापरवाही की मिसाल है? नियमित रूप से सभी अपस्तालों की मशीनों, विद्युत उपकरणों की जांच व सेफ्टी ऑडिट तो होना ही चाहिए।

अस्पतालों में बार-बार होती दुर्घटनाएं

अग्निशमन के पूरे उपाय होने चाहिए। आग लगने व धुआं फैलने से नवजात शिशुओं की मौत की घटनाएं बार-बार हो रही हैं लेकिन कोई सबक नहीं सीखा जा रहा है। भंडारा जिला अस्पताल में 9 जनवरी 2021 को शिशु गहन चिकित्सा इकाई (NISU) में आधी रात को इन्क्यूबेटर में लगी आग से 10 शिशुओं की प्राणहानि हुई थी। 25 मई 2024 को दिल्ली के विवेक विहार के बेबी केयर सेंटर में आग से 6 शिशुओं की मौत हुई थी। उसी वर्ष 15 नवंबर को झांसी के महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज के एनआईसीयू में आग से 10 नवजात शिशुओं की जान चली गई थी।

सुरक्षा मानकों और निगरानी की अनदेखी

22 अगस्त 2026 को छिंदवाड़ा शहर में बेबीवॉर्मर मशीन में आग लगने से 1 शिशु की मौत हुई थी तथा 2 झुलस गए थे। इन्क्यूबेटर या बेबीवॉर्मर का तापमान नियंत्रित होना बेहद जरूरी है। इसके लिए उपकरण अच्छी कंपनी के व पूर्णतः सुरक्षित होने चाहिए जिन पर समुचित देखरेख के साथ भरोसा किया जा सके। ऐसे अतिदक्षता वार्ड में नर्सों की लगातार ड्यूटी रहनी चाहिए ताकि ध्यान रहे कहीं मशीन का तापमान बढ़ने से शिशु को हानि तो नहीं पहुंच रही !

जवाबदेही का अभाव और परिचारिकाओं का साहस

अमरावती जिला महिला रुग्णालय (डफरिन अस्पताल) में पिछले 8 वर्षों में 8 ऐसी दुर्घटनाएं हुई हैं जिनमें नवजात शिशु व मरीजों को मिलाकर 77 लोगों की मृत्यु हुई। इसके लिए किसी को भी सजा नहीं हुई। इस समय परिचारिकाओं ने आग की परवाह न करते हुए 6 बच्चों को बचा लिया अन्यथा मृत्यु संख्या और बढ़ जाती।

आम जनता की मजबूरी और सरकारी व्यवस्था

जो संपन्न परिवार प्रसव के लिए हजारों रुपये का खर्च उठाने की क्षमता रखते हैं वह निजी अस्पतालों या नर्सिंग होम में प्रसूति करवाते हैं लेकिन मध्यमवर्ग के लोग और गरीब कहां जाएं? वे बड़े विश्वास के साथ सरकारी अस्पताल में डिलीवरी व देखभाल के लिए महिला को भर्ती कराते है कि वहां माता और नवजात शिशु का पूरा ध्यान रखा जाएगा। लेकिन ऐसे हादसे उन्हें भयानक दुख दे जाते हैं।

जांच और भविष्य में सुरक्षा की मांग

एक मां के लिए नौ माह तक कोख में रखने के बाद अपने नवजात शिशु को खो देना कितना भीषण आघात है। क्या गरीबों और साधनहीनों की जान की कीमत ही नहीं है? सरकारी अस्पतालों में व्याप्त लापरवाही जानलेवा साबित होती है। ऐसी घटना की जांच कर भविष्य में सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए।

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