Shri Premanand Ji Maharaj (Source. Pinterest) 
धर्म

मेरी ये प्रार्थना मान लो, क्या यह आपका आख़िरी मौका है आत्मजागरण का? सुनिए श्री प्रेमानंद जी महाराज की पुकार

Self-Awakening: Premanand Ji Maharaj की करुण पुकार है "मेरी ये प्रार्थना मान लो!" वे कहते हैं कि अनगिनत जन्मों से भोगों में उलझे रहने पर भी न सच्ची शांति मिली, न स्थायी विश्राम।

सिमरन सिंह

Service To Parents: आधुनिक भागदौड़ में हम सुख की तलाश में जीवन बिता देते हैं, फिर भी मन अशांत रहता है। पूज्य Premanand Ji Maharaj की करुण पुकार है "मेरी ये प्रार्थना मान लो!" वे कहते हैं कि अनगिनत जन्मों से भोगों में उलझे रहने पर भी न सच्ची शांति मिली, न स्थायी विश्राम। यदि अब भी भजन की ओर नहीं मुड़े, तो जन्मों-जन्म तक यह कमी बनी रहेगी।

भोग नहीं, भजन से मिलेगा विश्राम

मनुष्य गर्भ के नौ महीनों की पीड़ा भूल जाता है, पर सत्य यह है कि जीवन अनमोल अवसर है। महाराज का संदेश स्पष्ट है यदि ईश्वर-स्मरण से दूरी रही, तो बाहरी उपलब्धियाँ भी भीतर की रिक्तता नहीं भर पाएंगी। नाम-स्मरण और निष्काम भक्ति ही चित्त को स्थिर करती है।

चरित्र संकट: माता-पिता की उपेक्षा सबसे बड़ा दोष

आज हम बच्चों को धन कमाना सिखाते हैं, धर्म नहीं; पद पाना सिखाते हैं, परंपरा नहीं। परिणाम? वृद्ध माता-पिता उपेक्षित हो जाते हैं। महाराज चेताते हैं यह कर्मभूमि है; जो बीज आज बोओगे, वही फल कल "ब्याज" सहित लौटेगा। यदि आप स्वयं संतान को सत्संग से रोकते हैं, तो अनजाने में उन्हें उसी राह पर भेज रहे हैं जहाँ वे भविष्य में आपका अनादर कर सकते हैं।

माता-पिता की सेवा ही ईश्वर-आराधना

महाराज दृढ़ता से कहते हैं माता-पिता की सेवा करना भगवान को प्रसन्न करना है। वृद्धावस्था में यदि उनकी वाणी कठोर भी हो, तो क्रोध नहीं, करुणा रखें। उन्हें असहाय रूप में ईश्वर मानकर सेवा करें; इससे घर में लक्ष्मी और आध्यात्मिक समृद्धि बनी रहती है। कथाएँ बताती हैं कि साधारण कर्म करने वाला भी माता-पिता की निष्कपट सेवा से उच्च ज्ञान को प्राप्त कर सकता है, जबकि तपस्वी भी उनकी उपेक्षा से अधूरा रह जाता है।

श्रीधाम वृंदावन का संकल्प

परम मुक्ति की चाह रखने वालों के लिए मार्ग है वृंदावन का आश्रय चाहे भौतिक रूप से या हृदय में। सच्चा व्रजवासी धैर्य और विनम्रता को धारण करता है:

  • निंदा की जगह मौन।
  • दोष देखने के बजाय "अंधत्व"।
  • अपमान को अमृत समझकर सहन।
  • आघात पर भी शिला-सा धैर्य।
  • यह तप ही अंतर्मन को शुद्ध करता है।

अंतिम संदेश: जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति

मानव जीवन केवल कमाने के लिए नहीं, जन्म-मरण के चक्र को तोड़ने के लिए है। उच्च शिक्षा, यश और वैभव अस्थायी हैं; स्थायी मुक्ति केवल नाम-जप और एकनिष्ठ भक्ति से मिलती है। अपने धर्म पर चलें योग-क्षेम की चिंता ईश्वर स्वयं करता है। यदि वृंदावन में रहना संभव न हो, तो उसे अपने हृदय में बसाएं, सहनशील बनें और निरंतर नाम जपें। यही समय है इसे व्यर्थ न जाने दें।

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