Santan Saptami 7 Number: संतान सप्तमी के नाम में ही 'सप्तमी' यानी सातवीं तिथि या 7 नंबर का जिक्र मिलता है, लेकिन इस व्रत में 7 का महत्व सिर्फ तिथि तक नहीं है बल्कि पूजा की कई परंपराओं में सात गांठों वाले डोर से लेकर सात मालपूए तक का वर्णन मिलता है। संतान सप्तमी की पूजा में बार-बार 7 की संख्या क्यों आती है? आइए जानते हैं।
संतान सप्तमी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है। इसे ललिता सप्तमी और मुक्ताभरण सप्तमी के नाम से भी जाना जाता है।
2026 में उदयातिथि के अनुसार संतान सप्तमी का व्रत 18 सितंबर को रखा जाएगा।
संतान सप्तमी की पूजा में एक सूती धागे या कलावे में 7 गांठें लगाकर उसे भगवान शिव के सामने अर्पित की जाती है। इसे डोर को पूजा के बाद रक्षा सूत्र के रूप में धारण किया जाता है। यही वजह है कि संतान सप्तमी में 7 अंक केवल नाम से जुड़ी संख्या नहीं, बल्कि पूजा की एक प्रमुख परंपरा भी है।
इस व्रत में गुड़ और गेहूं के आटे से बने मीठे पूए का भोग लगाया जाता है, जिसकी संख्या 7 होती है। संतान सप्तमी व्रत के लिए कुल 21 पूए बनाए जाते हैं, जिसे कुछ इस तरह बांटा जाता है- 7 पूए का भोग, 7 पूए दान में और 7 पूए से पारण किया जाता है।
धार्मिक पुस्तकों में 7 की संख्या का उल्लेख कई जगह मिलता है- जैसे सप्तर्षि, सात सुर और विवाह के सात फेरे। इसलिए संतान सप्तमी में सप्तमी तिथि, सात गांठ और सात पूए जैसी परंपराओं को पूजा में खास स्थान दिया जाता है।
गुड़ और आटे से बने मीठे मालपूए संतान सप्तमी व्रत के भोग में प्रमुख रूप से बनाए जाते हैं। गुड़ को मिठास से और आटे को अन्न एवं पोषण से जोड़कर देखा जाता है। इसलिए इस कामना से बनाया जाता है कि संतान के जीवन में भी सुख-समृद्धि और मिठास बनी रहे।
सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लें।
भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करें।
चौकी पर शिव-पार्वती की प्रतिमा स्थापित करें।
दीपक, फूल, अक्षत, चंदन और नैवेद्य अर्पित करें।
सात गांठ वाला डोर पूजा में रखें।
गुड़-आटे के पूए का भोग लगाएं।
संतान सप्तमी की कथा पढ़ें या सुनें।
भगवान शिव और माता पार्वती की आरती करें।
डोर धारण करें और व्रत का पारण करें।