Bhagavad Gita Asana Rule: हिंदू पूजा-पद्धति में आसन केवल बैठने के लिए बिछाई जाने वाली चटाई नहीं होती है, बल्कि पूजा या ध्यान के लिए एक निश्चित स्थान तैयार करना है। अलग-अलग धर्म में आसन के लिए कुश, ऊन या किसी अन्य कपड़े का उल्लेख मिलता है। भगवद्गीता के अध्याय 6 के श्लोक 11 में भी ध्यान के लिए स्वच्छ स्थान पर आसन जमाने की बात कही गई है। इसका मतलब है न तो आसन ऊंचा होना चाहिए और न ही आसन बहुत नीचे होना चाहिए। इसमें कुश, वस्त्र और चर्म के बारे में वर्णित है।
कुशासन यानी कुश घास से बने आसन को सभी पूजा-पाठ और मंत्र-जप के लिए विशेष माना जाता है। कई पूजा-पद्धति में कुश के आसन को सबसे पवित्र आसन माना जाता है। कुश का आसन पूजा के दौरान मन को शांत और एकाग्र रखता है।
घर में रोजाना पूजा, ध्यान या मंत्र-जप के लिए ऊनी आसन का इस्तेमाल भी आमतौर पर किया जा सकता है। धार्मिक परंपरा में ऊन से बने आसन का उल्लेख मिलता है। ऊन के आसन के फायदे की बात करें, तो ऊन जमीन से आने वाली ठंड से शरीर को बचाता है और इससे लंबे समय तक बैठकर ध्यान करना आसान हो जाता है।
अगर आपके पास कुश या ऊन का आसन नहीं है, तो साफ और अलग रखा हुआ सूती कपड़ा भी बैठने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। हर घर में पूजा के लिए अलग आसन रखा जाता है। रोजाना की पूजा और संध्या आरती के लिए सूती आसन बेस्ट है।
कुछ परंपराओं में रेशम का आसन भी पूजा और विशेष अनुष्ठान में इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि, इसका इस्तेमाल घर की दैनिक पूजा में कम ही देखने को मिलता है। विशेष पूजा या लक्ष्मी पूजन में रेशम का आसन बहुत शुभ माना जाता है। रेशम के आसन को देवी लक्ष्मी से जोड़ा जाता है।
भगवद्गीता 6.11 में साधना के लिए स्थिर, स्वच्छ और एक उचित ऊंचाई वाले आसन का उल्लेख मिलता है। श्लोक में मूल रूप से ध्यान और योग-साधना है। व्यावहारिक रूप से भी आसन जमीन की ठंड या नमी से शरीर को अलग रखने और लंबे समय तक आराम से बैठने में मदद करता है।
आसन स्वच्छ और सूखा होना चाहिए।
पूजा के लिए इस्तेमाल होने वाला आसन अलग रखना अच्छा होता है।
आसन बहुत ऊंचा या बहुत नीचा नहीं होना चाहिए।
पूजा के दौरान ऐसी मुद्रा में बैठें जिसमें शरीर स्थिर और आरामदायक रहे।
लंबे समय तक पूजा या मंत्र-जप करना हो तो ऐसा आसन चुनें जिस पर आराम से बैठ सकें।
अगर आप सामान्य दैनिक पूजा के लिए आसन लेना चाहते हैं, तो साफ कुश, ऊन या सूती आसनका चुनाव करें। वहीं विशेष मंत्र-जप में आपकी परंपरा के अनुसार कुशासन का इस्तेमाल किया जा सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आसन स्वच्छ-साफ औऱ सतह के बराबर पर हो।
अपने पूजा के आसन को उठाएं।
उस स्थान पर जहाँ आपने पूजा के लिए आसन बिछाया था, वहां थोड़ा जल छिड़कें।
उस जल को अपनी आंखों और मस्तक पर लगाएं।
और इसके साथ बोलें- ॐ इंद्राय नमः, ॐ शक्राय नमः।