Pitru Paksha Mein Til Ka Mahatva: सनातन धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व है। 16 दिनों तक चलने वाले इस अवधि में पितरों की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए श्राद्ध, तर्पण और दान पुण्य किए जाते है। इस पूरे कर्मकांड में एक चीज का बड़ा महत्व बताया गया है। वो है काला तिल। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, काले तिल की उत्पत्ति भगवान विष्णु के पसीने से हुई है।
यह पितरों को तृप्त करने और नकारात्मक ऊर्जाओं को दूर रखने में सहायक माना जाता है। पितृपक्ष में बिना तिल के किया गया दान और तर्पण अधूरा माना जाता है। आइए जानते हैं पितृपक्ष में काले तिल का क्या महत्व है।
काले तिल को श्राद्ध के लिए सबसे जरूरी सामग्री माना जाता है और पितृ पक्ष की पूरी अवधि में काले तिल को हर कर्मकांड में प्रयोग किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, काले तिल भगवान विष्णु और पितरों से जुड़े कर्मों में विशेष महत्व रखते हैं।
तर्पण करते समय जल में काले तिल मिलाकर पूर्वजों को अर्पित करने की परंपरा है। मान्यता है कि तिल से किया गया तर्पण पितरों को संतुष्टि प्रदान करता है। इसी वजह से पितृपक्ष के दौरान तर्पण की विधि में काले तिल को शामिल किया जाता है।
सनातन हिन्दू परंपरा में तिल को पवित्र माना गया है। धार्मिक कर्मकांडों में तिल का इस्तेमाल लंबे समय से होता आया है। काले तिल को विशेष रूप से पितृ कर्म और तर्पण से जोड़ा जाता है।
धार्मिक एवं ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, काले तिल नकारात्मक ऊर्जा और अशुभ प्रभावों को दूर करने के लिए किया जाता हैं। इसलिए पितृपक्ष में जब पूर्वजों के लिए तर्पण किया जाता है, तब जल में काले तिल डालकर अर्पित करने की परंपरा निभाई जाती है।
ज्योतिषीय दृष्टिकोण से, काले तिल का संबंध शनि और राहु-केतु जैसे छाया ग्रहों से भी होता है। श्राद्ध के दौरान काले तिल का दान करने से कुंडली में मौजूद पितृ दोष और शनि दोष शांत होते हैं।
शास्त्रों में बताया गया है कि, पितरों को आत्मा को तृप्ति तथा मोक्ष के लिए जल में काले तिल मिलाकर अर्पित करना चाहिए। बिना तिल के अर्पण किया गया जल या भोजन दुष्ट आत्माएं ग्रहण कर लेती हैं, जबकि काले तिल अर्पित करने से तर्पण सीधे पितरों तक पहुंचता है और उनकी आत्मा को तृप्ति तथा मोक्ष मिलता है। यही नहीं इस दौरान तिल का दान सीधे पूर्वजों को जाता है।
अगर आप भी पितृ पक्ष में पूर्वजों का श्राद्ध करते समय दान में काले तिल नहीं देते हैं, तो आपकी इस एक गलती से पूर्वज नाराज हो सकते हैं। यही नहीं इसके बिना कोई भी दान पूर्वजों को स्वीकार्य नहीं होगा।