Pitru Paksha Karna Story: पितृपक्ष का समय हिंदू धर्म में पूर्वजों के स्मरण और उनके लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने के रूप में मनाया जाता है। पितृपक्ष की एक कथा दानवीर कर्ण से भी जुड़ी है।
कहा जाता है कि मृत्यु के बाद जब कर्ण स्वर्ग पहुंचे, तो उन्हें भोजन की जगह सोना और आभूषण दिए गए। आखिर ऐसा क्यों हुआ और इस कथा का पितृपक्ष से क्या संबंध है? आइए जानते हैं।
महाभारत के कर्ण को दानवीर कर्ण कहा जाता था। पौराणिक कथाओं में उनका वर्णन एक ऐसे योद्धा के रूप में मिलता है, जो कभी किसी को खाली हाथ नहीं जाने देते थे। उन्होंने अपने जीवन में धन, सोना और दूसरी कीमती वस्तुओं का खूब दान किया था। उनकी दानशीलता के कारण उन्हें दानवीर कर्ण कहा गया।
महाभारत के युद्ध में मृत्यु के बाद कर्ण की आत्मा स्वर्ग पहुंची। वहां उन्हें खाने के लिए भोजन की जगह सोना और आभूषण दिए गए। कर्ण यह देखकर हैरान रह गए और उन्होंने देवराज इंद्र से इसका कारण पूछा।
इंद्र ने कर्ण को बताया कि उन्होंने अपने जीवन में सोने और धन का खूब दान किया, लेकिन पूर्वजों के लिए अन्न और जल का दान नहीं किया। उन्होंने कभी अपने पितरों का तर्पण और पिंडदान भी नहीं किया। इसलिए स्वर्ग में उन्हें वही मिला, जो उन्होंने अपने जीवन में दान किया था।
कर्ण ने इंद्र को बताया कि उन्हें अपने जन्म और वंश के बारे में बहुत समय के बाद पता चला और इसी वजह से वह अपने पूर्वजों के लिए श्राद्ध या तर्पण नहीं कर पाए। कथा के अनुसार, उनकी बात सुनकर इंद्र ने उन्हें अपनी गलती सुधारने का अवसर दिया।
इंद्र ने कर्ण को कुछ समय के लिए वापस पृथ्वी पर जाने की अनुमति दी। जिसकी अवधि 15-16 दिन बताई जाती है। धरती पर लौटकर कर्ण ने अपने पूर्वजों के लिए श्राद्ध और तर्पण किया और अन्न, जल तथा वस्त्र का दान किया। पितृपक्ष में दान का विशेष महत्व है।
कर्ण द्वारा पूर्वजों के लिए किए गए श्राद्ध से जुड़ी इसी कथा को पितृपक्ष की शुरुआत से जोड़ा जाता है। पितृपक्ष के दौरान पूर्वजों का स्मरण, तर्पण, पिंडदान और अन्न-जल का दान करने का विशेष महत्व है।