मां स्कंदमाता (सौ. सोशल मीडिया)
धर्म

मां स्कंदमाता की पूजा से मिलता है संतान सुख और असीम ज्ञान, इन 4 जगहों पर देती है साक्षात दर्शन

Navratri Day 5: नवरात्रि के 5वें दिन मां स्कंदमाता की पावन साधना की जाती है। जानिए गोद में बाल कार्तिकेय को धारण करने वाली मां का अलौकिक स्वरूप और काशी व कुल्लू के सिद्ध मंदिरों की पूरी जानकारी।

अपूर्वा नायक

Highlights

  • नवरात्रि के पांचवें दिन करें मां स्कंदमाता की साधना

  • गोद में बाल कार्तिकेय और चतुर्भुज रूप में दिखता है मां का स्वरूप

  • पके केले और पीले मिष्ठान के भोग लगाने से मिलती है शारीरिक कष्टों से मुक्ति

  • तारकासुर वध और स्कंदमाता के प्राकट्य की पौराणिक कथा

  • काशी के जैतपुरा और कुल्लू घाटी की में हैं प्रसिद्ध ऐतिहासिक मंदिर

Shardiya Navratri Day 5 Skandmata Puja Vidhi: शारदीय नवरात्रि का पांचवां दिन आदिशक्ति के पंचम स्वरूप मां स्कंदमाता की परम पावन साधना को समर्पित होता है। स्कंदमाता साक्षात वात्सल्य, ममता और दिव्य मातृत्व की प्रतिमूर्ति हैं।

भगवान शिव और माता पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र, देवताओं के सेनापति 'कुमार कार्तिकेय' का एक नाम 'स्कंद' भी है। स्कंद अर्थात् कार्तिकेय की माता होने के कारण ही जगदंबा के इस ममतामयी स्वरूप को 'स्कंदमाता' कहकर पुकारा जाता है।

ज्योतिषीय दृष्टिकोण से मां स्कंदमाता बुध ग्रह को नियंत्रित करती हैं। इनकी पूजा से साधक को न केवल आध्यात्मिक शक्ति बल्कि संतान सुख, व्यापार में उन्नति और उच्च बौद्धिक क्षमता प्राप्त होती है।

चार भुजाएं और गोद में बाल कार्तिकेय

मां स्कंदमाता का स्वरूप अत्यंत सौम्य, ममतामयी और चित्त को शांति देने वाला है। सिंह पर सवार होने के बावजूद माता का यह रूप बेहद शांत दिखाई देता है। माता की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे अपनी दाहिनी ऊपर वाली भुजा से अपने पुत्र बाल कार्तिकेय को गोद में पकड़े हुए हैं। कार्तिकेय जी यहाँ अपने छह मुख वाले षडानन जैसे विराजमान हैं।

माता की चार भुजाएं हैं। एक हाथ में वे बाल स्कंद को संभाले हैं, दूसरी और तीसरी भुजा में कमल का फूल धारण करती हैं, और चौथी भुजा भक्तों को आशीर्वाद देने वाली अभय मुद्रा में रहती है। यद्यपि माता का वाहन सिंह है, परंतु वे कमल के आसन पर भी विराजमान रहती हैं। इसी कारण इन्हें 'पद्मासना देवी' भी कहा जाता है। इनका वर्ण पूर्णतः सफेद और कांतिमान है।

तारकासुर के वध के लिए स्कंदमाता का प्राकट्य

पौराणिक कथाओं के अनुसार, तारकासुर नाम के एक भयानक दैत्य ने कठोर तपस्या करके ब्रह्मा जी से वरदान मांगा था कि उसकी मृत्यु केवल शिवपुत्र के हाथों ही हो सके। तारकासुर जानता था कि सती के आत्मदाह के बाद भगवान शिव घोर वैराग्य में चले गए हैं, इसलिए उनकी कोई संतान नहीं होगी। वरदान पाते ही उसने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया।

देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन से एक परम प्रतापी तेज उत्पन्न हुआ, जिसने कुमार कार्तिकेय के रूप में जन्म लिया। कार्तिकेय को युद्ध कला सिखाने, उन्हें देवताओं का सेनापति बनाने और उनका लालन-पालन करने के लिए माता पार्वती ने स्वयं को 'स्कंदमाता' के रूप में प्रकट किया। माता की छत्रछाया में तैयार होकर कुमार कार्तिकेय ने महाबलशाली तारकासुर का वध किया और देवलोक को मुक्त कराया। इसी कारण मां स्कंदमाता की पूजा करने वाले साधक को कार्तिकेय जी की कृपा स्वतः ही प्राप्त हो जाती है।

ऐसा है मां स्कंदमाता का प्रिय भोग

नवरात्रि के पांचवें दिन साधक का मन 'विशुद्ध चक्र' में स्थित होता है। इस चक्र में स्थित होने पर साधक की वाणी में मधुरता और चित्त में एकाग्रता आती है। माता का विशेष पूजन विधान इस प्रकार है:---

मां स्कंदमाता को पके हुए केले का भोग अति प्रिय है। मान्यता है कि पांचवें दिन माता को केले का नैवेद्य लगाने से साधक का स्वास्थ्य उत्तम रहता है और उसे शारीरिक कष्टों से मुक्ति मिलती है। इसके अतिरिक्त माता को मिश्री, मावे की बर्फी और पीले रंग की मिठाइयों का भोग भी लगाया जाता है।

पंचमी तिथि को सुबह जल्दी उठकर स्नानादि के बाद पीले या रॉयल ब्लू रंग के वस्त्र धारण करें। माँ की प्रतिमा के सामने दीपक जलाएं। माता और बाल कार्तिकेय दोनों को कुमकुम, चंदन, हल्दी और अक्षत का तिलक लगाएं।

माता को पीले रंग के गेंदा फूल या कमल के पुष्प अर्पित करें।

इसके बाद दुर्गा सप्तशती के पांचवें अध्याय का पाठ करें और अंत में कपूर से आरती उतारें।

स्कंदमाता की साधना का महामंत्र

पूजा के समय इस अचूक मंत्र का 108 बार जाप अवश्य करें:---

सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।

शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥

इसके साथ ही साथ "ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः" का भी निरंतर मानसिक जाप किया जा सकता है।

इन जगहों पर है मां स्कंदमाता का स्वरूप

यूं तो नवदुर्गा के रूप में मां स्कंदमाता की पूजा हर जगह होती है, लेकिन भारत में उनके कुछ विशिष्ट और ऐतिहासिक प्राचीन मंदिर हैं:---

1. काशी का ऐतिहासिक स्कंदमाता मंदिर

आध्यात्मिक नगरी वाराणसी के जैतपुरा क्षेत्र में मां स्कंदमाता का देश का सबसे प्रसिद्ध और पौराणिक मंदिर स्थित है। स्कंद पुराण के काशी खंड के अनुसार, नवदुर्गा यात्रा के पांचवें दिन इस मंदिर के दर्शन का विशेष महात्म्य है। इस मंदिर के बारे में यह अटूट विश्वास है कि जो दंपत्ति संतान सुख से वंचित हैं, वे यदि नवरात्रि की पंचमी को यहाँ आकर माता की गोद खाली न रहने की प्रार्थना करते हैं, तो माता उनकी झोली अवश्य भर देती हैं।

2. कुल्लू घाटी का स्कंदमाता मंदिर

देवभूमि हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले की सुरम्य वादियों में मां स्कंदमाता को समर्पित एक अति प्राचीन मंदिर है। पहाड़ों के बीच स्थित इस मंदिर में माता को प्रकृति की रक्षक और फसलों की अधिष्ठात्री देवी के रूप में पूजा जाता है। यहाँ नवरात्रि के पांचवें दिन स्थानीय लोक वाद्यों की थाप पर पारंपरिक कुल्लूई नृत्य और महाआरती का आयोजन होता है।

3. कोंडागांव का मां स्कंदमाता मंदिर

छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के कोंडागांव जिले में मां स्कंदमाता का एक सिद्ध पीठ स्थित है। यहाँ की स्थानीय लोक कथाओं में माता को बस्तर की रक्षक देवी माना गया है। नवरात्रि के दौरान यहाँ विशाल मेले का आयोजन होता है, जहाँ दूर-दूर से वनवासी समाज के लोग अपनी पारंपरिक मन्नतें लेकर माता के दरबार में शीश नवाने पहुंचते हैं।

4. पेरुआर का स्कंदमाता पीठ

दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में, विशेषकर तमिलनाडु और केरल की सीमाओं पर, कार्तिकेय अर्थात् भगवान मुरुगन की माता के रूप में स्कंदमाता के विग्रहों की पूजा की जाती है। यहाँ उन्हें 'पार्वती अम्मन' या 'स्कंद जननी' के रूप में बेहद भव्य और द्रविड़ शैली में बने मंदिरों में पूजा जाता है, जहाँ पंचमी के दिन विशेष कार्तिकेय अभिषेकम भी किया जाता है।

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