भगवान श्रीगणेश 
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गणेश चतुर्थी 2025: कैसे गणेश जी हाथी के सिर वाले बने भगवान, जानिए पुराण में वर्णित कथा

Ganesh Utsav: भगवान श्रीगणेश के उत्सव की शुरुआत 27 अगस्त से हो गयी है। 10 दिनों चलने वाले इस उत्सव में प्रथम पूज्य श्रीगणेश जी की पूजा की जाती है। क्या आप जानते हैं गणेश जी की उत्पत्ति की कथा....

दीपिका पाल

Lord Ganesha Story In Hindi:  भगवान श्रीगणेश के उत्सव की शुरुआत 27 अगस्त से हो चुकी है। देश के कई हिस्सों में 10 दिनों चलने वाले इस उत्सव में प्रथम पूज्य श्रीगणेश जी की पूजा की जाती है। कहा जाता है कि, किसी शुभ कार्य या नए कार्य की शुरुआत से पहले सभी देवी-देवताओं में भगवान श्रीगणेश का पूजन किया जाता है।भगवान गणेश भगवान शिव और माता पार्वती के सबसे छोटे पुत्र हैं। उनके बड़े भाई स्वामी कार्तिकेय है, भगवान गणेश की पत्नी का नाम रिद्धि और सिद्धि है।

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार जानकारी मिलती है कि, भगवान श्रीगणेश जी का जन्म स्थान कैलाश मानसरोवार या उत्तरकाशी जिले का डोडीताल है। श्रीगणेश का जन्म शुभ तिथि माथुर ब्राह्मणों के इतिहास अनुसार, अनुमानत: 9938 विक्रम संवत पूर्व भाद्रपद माह की शुक्ल चतुर्थी को मध्याह्न के समय की मानी जाती है। भगवान श्रीगणेश के जन्म से जुड़ी कथा का उल्लेख पुराण में मिलता है चलिए जानते है...

भगवान गणेश जी के जन्म की कहानी

पुराण के अनुसार, भगवान श्रीगणेश की उत्पत्ति से जुड़ी इस कथा के बारे में हर कोई जानते है। कैसे गणेश जी हाथी के सिर वाले भगवान बने। जब पार्वती शिव के साथ उत्सव क्रीड़ा कर रहीं थीं, तब उन पर थोड़ा मैल लग गया। जब उन्हें इस बात की अनुभूति हुई, तब उन्होंने अपने शरीर से उस मैल को निकाल दिया और उससे एक बालक बना दिया। फिर उन्होंने उस बालक को कहा कि जब तक वे स्नान कर रहीं हैं, वह वहीं पहरा दे। जब शिवजी वापिस लौटे, तो उस बालक ने उन्हें पहचाना नहीं और उनका रास्ता रोका। तब भगवान शिव ने उस बालक का सिर धड़ से अलग कर दिया और अंदर चले गए। यह देखकर पार्वती बहुत हैरान रह गयीं। उन्होंने शिवजी को समझाया कि वह बालक तो उनका पुत्र था, और उन्होंने भगवान शिव से विनती करी कि वे किसी भी कीमत पर उसके प्राण बचाएं।

तब भगवान शिव ने अपने सहायकों को आज्ञा दी कि वे जाएं और कहीं से भी कोई ऐसा मस्तक लेकर आएं जो उत्तर दिशा की ओर मुंह करके सो रहा हो। तब शिवजी के सहायक एक हाथी का सिर लेकर आए, जिसे शिवजी ने उस बालक के धड़ से जोड़ दिया और इस तरह भगवान गणेश का जन्म हुआ।

श्री गणेश जन्म से जुड़ी कथा (सौ. सोशल मीडिया)

इस कथा का मिलता है उल्लेख

एक अन्य कथा के अनुसार, प्राचीन समय में सुमेरू पर्वत पर सौभरि ऋषि का अत्यंत मनोरम आश्रम था। उनकी अत्यंत रूपवती और पतिव्रता पत्नी का नाम मनोमयी था। एक दिन ऋषि लकड़ी लेने के लिए वन में गए और मनोमयी गृह-कार्य में लग गई। उसी समय एक दुष्ट कौंच नामक गंधर्व वहाँ आया और उसने अनुपम लावण्यवती मनोमयी को देखा तो व्याकुल हो गया।

उस दौरान ही कौंच ने ऋषि-पत्नी का हाथ पकड़ लिया। रोती और काँपती हुई ऋषि पत्नी उससे दया की भीख माँगने लगी। उसी समय सौभरि ऋषि आ गए। उन्होंने गंधर्व को श्राप देते हुए कहा 'तूने चोर की तरह मेरी सहधर्मिणी का हाथ पकड़ा है, इस कारण तू मूषक होकर धरती के नीचे और चोरी करके अपना पेट भरेगा।

शिवशक्ति औऱ बाल गणेश (सौ. सोशल मीडिया)

काँपते हुए गंधर्व ने मुनि से प्रार्थना की-'दयालु मुनि, अविवेक के कारण मैंने आपकी पत्नी के हाथ का स्पर्श किया था। मुझे क्षमा कर दें। ऋषि ने कहा मेरा श्राप व्यर्थ नहीं होगा, तथापि द्वापर में महर्षि पराशर के यहाँ गणपति देव गजमुख पुत्र रूप में प्रकट होंगे (हर युग में गणेशजी ने अलग-अलग अवतार लिए) तब तू उनका डिंक नामक वाहन बन जाएगा, जिससे देवगण भी तुम्हारा सम्मान करने लगेंगे। सारे विश्व तब तुझें श्रीडिंकजी कहकर वंदन करेंगे।

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