जितिया व्रत कथा  (सौ. सोशल मीडिया)
धर्म

Jitiya Vrat 2026: इसलिए व्रत में पढ़ी जाती है चील और सियारिन की पौराणिक कथा, क्यों टूटा था सियारिन का व्रत

Jivitputrika Vrat Katha: जितिया व्रत की पौराणिक कथा में चील और सियारिन की कहानी है। श्रद्धा से व्रत रखने वाली चील को संतान सुख मिला। जानिए पूरी कथा और क्यों सुनना जरूरी है ये कहानी।

अपूर्वा नायक

Jivitputrika Cheel Siyarin Vrat Katha: जितिया व्रत का हिंदू धर्म में बहुत बड़ा महत्व है। कहा जाता है कि इस व्रत की कथा को सच्चे मन से सुनने या पढ़ने से संतान की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली का आशीर्वाद मिलता है।

माताएं अपनी संतान की रक्षा, अच्छी सेहत और लंबी उम्र के लिए यह व्रत रखती हैं। इस कथा को सुनने से मातृत्व की श्रद्धा और त्याग की भावना और मजबूत होती है। मान्यता है कि कथा सुनने से व्रत का पूरा फल मिलता है और भगवान जीमूतवाहन की कृपा से बच्चों पर आने वाले संकट टल जाते हैं।

चील और सियारिन की मित्रता से शुरू हुई कथा

बहुत पुराने समय की बात है। एक जंगल में एक चील और एक सियारिन रहती थीं। दोनों में बहुत गहरी दोस्ती थी। दोनों हर समय साथ ही रहती थीं। एक दिन उन्होंने कुछ महिलाओं को जितिया व्रत करते हुए देखा। महिलाएं भगवान जीमूतवाहन की पूजा कर रही थीं। चील और सियारिन को यह देखकर उत्सुकता हुई। उन्होंने महिलाओं से इस व्रत के बारे में पूछा। जब उन्हें पता चला कि यह व्रत संतान की लंबी उम्र और सुख के लिए रखा जाता है, तो दोनों ने भी यह व्रत रखने का फैसला कर लिया। दोनों ने संतान की मंगलकामना से जितिया व्रत का संकल्प लिया।

किसने पूरा किया व्रत और किसने तोड़ा नियम

जब व्रत का दिन आया, तो दोनों ने उपवास रखा। दोनों ने भगवान जीमूतवाहन का नाम लिया और पूजा की। चील ने पूरी श्रद्धा और नियम के साथ व्रत किया। उसने पूरे दिन संयम रखा। भूख-प्यास को सहन किया और अपना मन पूजा में लगाए रखा। उसने व्रत का एक भी नियम नहीं तोड़ा। लेकिन सियारिन से भूख बर्दाश्त नहीं हुई। रात होते-होते उसे बहुत तेज भूख लगने लगी। वह खुद को रोक नहीं पाई और उसने चुपके से खाना खा लिया। इस तरह उसने व्रत का नियम तोड़ दिया। एक तरफ चील ने निष्ठा से पूरा व्रत किया, तो दूसरी तरफ सियारिन व्रत पूरा नहीं कर पाई।

अगले जन्म में बनी दोनों बहनें

कहा जाता है कि समय बीतने के बाद दोनों ने मनुष्य के रूप में जन्म लिया। पिछले जन्म के कर्मों के कारण दोनों इस जन्म में बहनें बनीं।

बड़ी बहन के रूप में चील ने जन्म लिया और छोटी बहन के रूप में सियारिन ने जन्म लिया। दोनों ही बहुत अच्छे और धर्म को मानने वाले परिवार में जन्मी थीं। बड़ी बहन की शादी एक राजपरिवार में हुई। छोटी बहन की शादी भी एक अमीर और संपन्न परिवार में हुई। शादी के बाद दोनों के जीवन में संतान का सुख भी आया।

एक को मिला सुख, दूसरी को मिला दुख

बड़ी बहन आज भी जितिया व्रत की महिमा को जानती थी। वह हर साल पूरे नियम और श्रद्धा से व्रत रखती थी। वह अपनी संतान की लंबी उम्र के लिए भगवान जीमूतवाहन की पूजा करती थी। इसलिए उसकी सभी संतानें स्वस्थ और सुखी रहीं। उसके घर में हमेशा खुशहाली रही। लेकिन छोटी बहन के साथ ऐसा नहीं हुआ। उसकी संतानें जन्म तो लेती थीं, लेकिन ज्यादा समय तक जीवित नहीं रह पाती थीं। हर बार उसे संतान खोने का दुख झेलना पड़ता था। इससे वह बहुत दुखी और परेशान रहने लगी।

बड़ी बहन ने बताया व्रत का असली महत्व

एक दिन छोटी बहन ने रोते हुए अपनी बड़ी बहन से इसका कारण पूछा। उसने कहा कि ऐसा क्यों हो रहा है। तब बड़ी बहन ने उसे पिछले जन्म की पूरी बात बताई। उसने कहा कि पिछले जन्म में तुमने भूख के कारण व्रत तोड़ दिया था, जबकि मैंने पूरा व्रत निष्ठा से किया था। उसी का फल है कि मेरी संतान सुखी है। बड़ी बहन ने समझाया कि जितिया व्रत सिर्फ भूखे रहने का नाम नहीं है। इसका असली मतलब है श्रद्धा, संयम और पूरे संकल्प के साथ भगवान जीमूतवाहन को याद करना। नियमों का पालन करना बहुत जरूरी है। छोटी बहन को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने भगवान जीमूतवाहन से माफी मांगी और आगे से पूरे विधि-विधान और श्रद्धा से जितिया व्रत रखने का संकल्प लिया।

भगवान जीमूतवाहन की कृपा

कहा जाता है कि भगवान जीमूतवाहन त्याग, दया और संतान की रक्षा के प्रतीक हैं। उनकी कृपा से ही बच्चों की रक्षा होती है और परिवार में सुख-शांति आती है। इसीलिए हर साल माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र और सुरक्षा के लिए जितिया व्रत रखती हैं और इस पवित्र कथा को सुनती हैं। अंत में प्रार्थना की जाती है कि... हे भगवान जीमूतवाहन, जिस तरह आपने अपने भक्तों और उनकी संतानों की रक्षा की, उसी तरह सभी माताओं की संतानों को स्वस्थ, लंबी उम्र और खुशहाल जीवन दें।

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