Jitiya Vrat Mahabharat Connection: आज देश के कई हिस्सों में माताओं द्वारा जीवित्पुत्रिका या जितिया का पवित्र व्रत रखा जा रहा है।
वंश वृद्धि, संतान की लंबी आयु और उनके निरोगी जीवन की कामना के लिए महिलाएं यह 24 घंटे का निर्जला उपवास रखती हैं। महापर्व छठ की तरह ही इस व्रत को भी पूरे तीन दिनों तक नियम और विधि-विधान के साथ मनाया जाता है।
जितिया व्रत के दिन माताएं भगवान जीमूतवाहन की पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना करती हैं। इस पावन अवसर पर कई तरह की पारंपरिक रस्में भी निभाई जाती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखने से बच्चों के सिर पर आने वाला हर संकट टल जाता है और उनके जीवन में खुशहाली आती है।
इस कठिन व्रत की शुरुआत का संबंध सीधे महाभारत काल से माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, पिता की मृत्यु से क्रोधित होकर अश्वत्थामा ने पांडवों के शिविर में सो रहे द्रौपदी के पांचों पुत्रों को पांडव समझकर मार डाला था। इस घोर अपराध के बाद अर्जुन ने अश्वत्थामा को बंदी बना लिया और उसकी माथे की दिव्य मणि छीन ली। बदला लेने के लिए अश्वत्थामा ने अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा की अजन्मी संतान को नष्ट करने के उद्देश्य से ब्रह्मास्त्र चला दिया।
अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र के वार से उत्तरा के गर्भ में पल रही संतान का जन्म से पहले ही अंत हो गया। पांडवों और उत्तरा को इस गहरे दुख से उबारने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने हस्तक्षेप किया। चूंकि पांडव वंश की रक्षा के लिए उस बच्चे का जन्म लेना आवश्यक था, इसलिए श्रीकृष्ण ने अपने सभी पुण्यों का फल उस मृत शिशु को समर्पित कर दिया।
भगवान श्रीकृष्ण के पुण्य-दान से गर्भ में ही मृत पड़े शिशु में फिर से प्राणों का संचार हो गया और वह जीवित हो उठा। गर्भ में मरकर दोबारा जीवन पाने के कारण उस बालक का नाम "जीवित्पुत्रिका" पड़ा। यही बालक बड़े होकर इतिहास में राजा परीक्षित के नाम से प्रसिद्ध हुए। तभी से अपनी संतान की लंबी उम्र और रक्षा के लिए आश्विन मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को माताएं यह कठिन व्रत रखती आ रही हैं।