Salabega Jagannath History: भगवान जगन्नाथ के परम भक्त कहे जाने वाले सलाबेग कहते हैं, निम्न जाति में जन्म लेने के बावजूद, मैं भगवान जगन्नाथ के चरणों में सेवा करने के लिए जीता हूँ। सलाबेग एक कवि थे, उनके सबसे पूजनीय भजनों में से एक है, 'अहे नीला सैला' गीत की यह सुंदर पंक्ति आज भी हर ओडिया घर में गूंजती है, विशेषकर रथ यात्रा उत्सव के दौरान।
महाप्रभु जगन्नाथ के परम भक्त कवि सलाबेग, ने भगवान के समक्ष इस प्रकार समर्पण किया कि उनका प्रेम जाति, जन्म या धर्म की सीमाओं से परे था। मुस्लिम होने के बावजूद, उनकी भक्ति ने जगन्नाथ रथ यात्रा की कई सारी परंपराओं में से एक कही जाने वाली सबसे मार्मिक परंपरा की शुरुआत की, जिसका पालन आज भी पूरी निष्ठा से किया जाता है। रथ यात्रा के दौरान, भगवान जगन्नाथ का नंदी घोष रथ सलाबेग की समाधि के पास कुछ देर के लिए रोका जाता है। यह 17वीं शताब्दी के संत-कवि के प्रति सम्मान को दर्शाता है।
कहा जाता है कि महाप्रभु जगन्नाथ के महानतम भक्तों में से एक माने जाने वाले सलाबेग, मुगल सूबेदार मिर्जा लालबेग और एक हिंदू ब्राह्मण महिला के पुत्र थे। हालांकि उनका जन्म एक मुस्लिम परिवार में हुआ था, फिर भी सलाबेगा अपनी माता के धर्म से बेहद प्रभावित थे। दरअसल एक युद्ध में मृत्यु के करीब पहुंचने के बाद उनका समर्पण भगवान जगन्नाथ के प्रति हो गया।
युद्ध के दौरान उन्हें गंभीर चोटें आई थीं और कई तरह के इलाज के बावजूद उनके ठीक होने की उम्मीद बहुत कम थी। जब मेडिकल इलाज काम नहीं आया, तो उन्होंने अपनी मां की बात मानी और भगवान जगन्नाथ से प्रार्थना की। अपनी मां पर भरोसा करके, सलाबेगा ने सच्चे मन से महाप्रभु से प्रार्थना की। फिर उन्हें सपने में एक दिव्य रूप दिखाई दिया जिसने उनके घाव को ठीक कर दिया। उनका मानना था कि यह महाप्रभु की कृपा थी। उस पल ने सलाबेगा की जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी।
उस दिव्य अनुभव के बाद, सलाबेगा ने सब त्याग दिया और अपनी पूरी जिंदगी भगवान जगन्नाथ की पूजा में लगा दी। उन्होंने अनगिनत भक्ति गीत लिखे जो आज भी ओडिया घरों में गाए जाते हैं। उनके लिखे कुछ लोकप्रिय भजनों में 'आहे नीला शैला', 'एका तो भक्त जीवन', और 'चली चलीजा नीलगिरी कालिया' शामिल हैं।
सलाबेगा से जुड़ी सबसे प्यारी कहानियों में से एक उस रिश्ते की झलक दिखाती है जो उनके और भगवान जगन्नाथ के बीच था। एक बार, वृंदावन से पुरी में रथ यात्रा में शामिल होने के लिए लौटते समय, भारी बारिश के कारण सलाबेगा को देर हो गई। जब वे तीर्थ नगरी से दूर फंसे हुए थे, तो उन्होंने महाप्रभु से प्रार्थना की कि उनके पहुँचने तक रथ आगे न बढ़े और तभी जैसे प्रभु ने उनकी प्रार्थना सुन ली और गुंडिचा की ओर जाते हुए, जब भगवान जगन्नाथ का रथ बड़ा डंडा पर चल रहा था, तो वह बालागंडी के पास रुक गया।
मंदिर के सेवकों की तमाम कोशिशों के बावजूद रथ आगे नहीं बढ़ा। जब सलाबेगा उस जगह पर पहुँचे, तभी रथ फिर से आगे बढ़ना शुरू हुआ। अब उसी जगह पर सलाबेगा मंदिर बनाया गया है। महाप्रभु का रथ आज भी हर साल वहां रुकता है, ताकि भगवान अपने प्रिय भक्त से मिल सकें।
चूंकि सलाबेगा को उनका धर्म मंदिर में प्रवेश की इजाजत नहीं देता था, इसलिए वे बाहर से ही भगवान की पूजा करते थे। वे रोज श्रीमंदिर जाते थे और हर साल रथ यात्रा में शामिल होते थे। 1664 में उनके निधन के बाद, उस समय के गजपति महाराजा ने आदेश दिया कि इस मुस्लिम भक्त के सम्मान में सलाबेगा को बालागंडी में बड़ा डंडा के पास दफनाया जाए। बाद में उनकी समाधि को सलाबेगा मंदिर के नाम से जाना जाने लगा।
आज भी उनकी समाधि पीठ पर रोज फूल, अगरबत्ती और फल चढ़ाए जाते हैं। आस्था और सांप्रदायिक सद्भाव की यह कहानी बताती है कि भक्त और प्रभु के बीच बस आस्था मायने रखती है।