पितृ पक्ष (सौ.सोशल मीडिया)
धर्म

पूर्वज की मृत्यु तिथि पता न हो तो इस दिन करें श्राद्ध, जानें दुर्घटना में मृत्यु होने पर क्या है नियम

Pitru Paksha: जिन लोगों की मृत्यु की दिन तारीख याद न हो या जिनकी मृत्यु किसी दुर्घटना के कारण हुई हो, उनकी श्राद्ध की कौन-सी तिथि मानी जाती है? जानें पितृ पक्ष 2026 में श्राद्ध से जुड़े जरूरी नियम।

सीमा कुमारी

Pitaron Ka Shraddha Kab Kare: इस साल पितृ पक्ष की शुरुआत 26 सितंबर, शनिवार से हो रही है। पितृपक्ष को हिंदू धर्म में पूर्वजों को याद करने और उनके प्रति श्रद्धा जताने का खास समय बताया गया है। धर्म शास्त्रों के अनुसार, पितृपक्ष के दौरान पितरों का श्राद्ध उसी तिथि पर किया जाना चाहिए, जिस तिथि को उनका निधन हुआ था।

वहीं, बताया जाता है कि, जिन लोगों की मृत्यु की दिन तारीख याद न हो या जिनकी मृत्यु किसी दुर्घटना के कारण हुई हो, उनका श्राद्ध पितृपक्ष की कुछ विशेष तिथियों पर किया जाता है। आज इसी विषय में हम आपको बताएंगे कि ऐसी स्थिति में किस तिथि पर श्राद्ध करना उचित माना जाता है।

मृत्यु की तिथि याद न होने पर इन तिथियों में करें श्राद्ध

सर्वपितृ अमावस्या

धर्म शास्त्रों के अनुसार, जिन लोगों की मृत्यु की दिन तारीख याद न हो या जिनकी मृत्यु किसी दुर्घटना के कारण हुई हो, उनका श्राद्ध सर्वपितृ अमावस्या के दिन कराना शुभ होता हैं। इसे महालया अमावस्या भी कहते हैं। इस दिन सभी ज्ञात और अज्ञात पूर्वजों का तर्पण किया जा सकता है, जिनकी तिथि याद न हो।

मातृ नवमी

अगर मातृ पितरों यानि की माता, बहन, चाची आदि महिला पितरों की मृत्यु की तिथि आपको ज्ञात नहीं है तो आप पितृपक्ष में नवमी तिथि पर मातृ पितरों का श्राद्ध कर सकते हैं। इस दिन श्राद्ध और तर्पण करने से मातृ पितृ प्रसन्न होते हैं और इसलिए पितृपक्ष की नवमी को मातृ नवमी भी कहा जाता है।

सर्वपितृमोक्ष अमावस्या

अगर किसी कारण से पितृपक्ष की अन्य तिथियों पर पितरों का श्राद्ध करने चूक गए हैं या मृत्यु की तिथि याद नहीं है तो अमावस्या तिथि पर सभी पितरों का श्राद्ध कर सकते हैं। शास्त्र के अनुसार, इस दिन श्राद्ध करने से कुल के सभी पितरों का श्राद्ध हो जाता है।

इसके अलावा, शास्त्रों में ये भी बताया गया है कि, जिनका मरने के बाद संस्कार नहीं हुआ हो, उनका भी अमावस्या तिथि को ही श्राद्ध करना चाहिए। बाकी तो जिनकी जो तिथि हो, श्राद्ध पक्ष में उसी तिथि पर श्राद्ध करना चाहिए।

यही उचित भी है। गया जी में फल्गु नदी के किनारे इस तिथि को पितरों के निमित तर्पण और श्राद्ध वंशज के द्वारा करना शास्त्रोस्त सर्वोत्तम विधि है। पितृगणों के निमित तर्पण करने से तृप्त होकर अपने वंशज को सुख समृद्धि एवं संतति को शुभाशीर्वाद देते हैं।

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