Ganpati Eco Friendly Visarjan: गणेश चतुर्थी के बाद गणपति विसर्जन के समय अकसर पूजा की कई सामग्री बच जाती है। फूल-माला, दूर्वा, अक्षत, नारियल, कलश का पानी और दूसरी पूजन सामग्री को लेकर हमेशा असमंजस रहता है कि इन्हें कैसे डिस्पोज किया जाए।
धार्मिक परंपराओं में पूजा के बाद बची सामग्री को निर्माल्य कहा जाता है। इसे सम्मान के साथ अलग करना और पर्यावरण का ध्यान रखते हुए उचित तरीके से डिस्पोज करना चाहिए। इसे नदी में प्रवाहित न करें, इससे नदी में गंदगी फैलेगी और पानी दूषित होगा।
गणपति को चढ़ाए गए फूल, माला और पत्तियों को विसर्जन के समय पानी में डालने के बजाय अलग कर लें। इनमें से प्लास्टिक, धागा और दूसरी आर्टिफिशियल चीजें निकाल दें। प्राकृतिक फूलों और पत्तियों को सुखाकर गमले की मिट्टी में डाला दें या कंपोस्ट की तरह इस्तेमाल करें। चाहें तो स्थानीय निर्माल्य संग्रह व्यवस्था में भी दिया जा सकता है।
गणेश पूजा में दूर्वा का खास महत्व माना जाता है। बची हुई दूर्वा को अलग करके किसी गमले की मिट्टी में डाल सकते हैं। अगर आसपास पौधे हैं तो उसे उनकी मिट्टी में भी मिला सकते हैं।
पूजा में इस्तेमाल हुए चावल यानी अक्षत को भी अलग रखें। अगर चावल साफ हैं और उन पर रोली, सिंदूर या दूसरी सामग्री नहीं लगी है, तो उन्हें पक्षियों के लिए रख दें, लेकिन यदि रंग या अन्य पूजा सामग्री लगी हो तो उसे मिट्टी या कंपोस्ट में डाल दें।
पूजा का साबुत और खाने योग्य नारियल प्रसाद के रूप में परिवार में बांटा जाना चाहिए। इसी तरह बचा हुआ अच्छा प्रसाद भी सभी के बीच बांट दें।
कलश में बचा पानी सीधे नाली में बहाने के बजाय घर के पौधों या मिट्टी में डाल देना चाहिए। कलश, पूजा की थाली, दीपक और दूसरे बर्तनों को धोकर दोबारा पूजा में इस्तेमाल करें।
गणेश जी के विसर्जन के बाद फूलों के साथ लगी प्लास्टिक की माला, पन्नी, थर्मोकोल, रिबन या दूसरी कृत्रिम सजावट को मिट्टी या पानी में न डालें। इन्हें अलग करके संबंधित कचरा या रीसाइक्लिंग के लिए दे दें। साथ ही जिन चीजों का इस्तेमाल दोबारा हो सकता है, उसे अच्छी तरह से स्टोर कर लें।