100 Brothers Of Kauravas: महाभारत की कथा में एक सवाल अक्सर लोगों के मन में उठता है जब कौरवों के 100 भाई थे, तो फिर युद्ध और इतिहास में सबसे ज्यादा चर्चा दुर्योधन की ही क्यों होती है? बाकी 99 भाई आखिर कहाँ थे और उन्होंने दुर्योधन का विरोध क्यों नहीं किया? इस सवाल का जवाब उस समय की परिवार व्यवस्था और परंपराओं में छिपा हुआ माना जाता है।
पुराने समय में परिवार और समाज में बड़े पुत्र को विशेष स्थान दिया जाता था। उसे परिवार का मार्गदर्शक और जिम्मेदार व्यक्ति माना जाता था। अक्सर छोटे भाई-बहनों को उसकी आज्ञा मानने के लिए प्रेरित किया जाता था। परिवार के निर्णयों में बड़े भाई की भूमिका इतनी महत्वपूर्ण होती थी कि कई बार पिता भी बड़े बेटे को भाई के समान सम्मान देते थे। यही कारण था कि छोटे भाई अक्सर उसके फैसलों का विरोध नहीं करते थे और उसी के अनुसार काम करते थे।
राजघरानों में जिस पुत्र को युवराज घोषित किया जाता था, उसकी परवरिश अन्य भाइयों से अलग तरीके से होती थी। उसे बचपन से ही नेतृत्व, निर्णय और सत्ता की जिम्मेदारी के लिए तैयार किया जाता था। दुर्योधन को भी भविष्य का राजा मानकर उसी प्रकार की शिक्षा और प्रशिक्षण दिया गया था। इसलिए उसके भाई उसे नेता मानते थे और उसकी बातों का विरोध करने से बचते थे। यही वजह थी कि कौरवों के बाकी भाई एक सूत्र में बंधे हुए दिखाई देते थे और दुर्योधन के खिलाफ खुलकर खड़े नहीं हुए।
हालांकि कौरवों में एक ऐसा भी भाई था जिसने दुर्योधन का विरोध किया। उसका नाम युयुत्सु था, जो धृतराष्ट्र का सौतेला पुत्र माना जाता है। महाभारत युद्ध की शुरुआत में ही उसने कौरवों का साथ छोड़कर पांडवों की ओर से युद्ध लड़ने का फैसला किया। इसी कारण उसे अलग पहचान मिली, वरना वह भी केवल कौरवों में गिना जाता।
महाभारत की कथा में कई विद्वान मानते हैं कि दुर्योधन के स्वभाव के पीछे धृतराष्ट्र और गांधारी की परवरिश भी एक कारण थी। धृतराष्ट्र स्वयं को हमेशा सिंहासन का असली हकदार मानते थे। इसी सोच के कारण वे दुर्योधन को यह समझाने में असफल रहे कि पांडवों का भी राज्य पर अधिकार है। वहीं गांधारी ने पति के प्रति समर्पण दिखाने के लिए अपनी आँखों पर पट्टी बांध ली, जिसके कारण वे पुत्रों के जीवन में सक्रिय मार्गदर्शन नहीं दे सकीं।
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उस दौर में परिवारों में अक्सर एक व्यक्ति के नेतृत्व को स्वीकार करना आदर्श व्यवस्था माना जाता था। ठीक उसी तरह जैसे पांडवों में सभी भाई युधिष्ठिर के निर्णयों का पालन करते थे। इसलिए कौरवों के बाकी भाई भी दुर्योधन के साथ खड़े रहे चाहे उसके निर्णय सही हों या गलत।
महाभारत केवल युद्ध की कहानी नहीं, बल्कि परिवार, सत्ता और निर्णयों के परिणाम की भी सीख देता है। यदि समय पर सही मार्गदर्शन मिलता, तो शायद इतिहास की यह सबसे बड़ी लड़ाई टल सकती थी।