Duryodhana Temple (Source. Pinterest) 
धर्म

महाभारत का सबसे बड़ा खलनायक, फिर भी यहां होती है पूजा! दुर्योधन का रहस्यमयी मंदिर जानकर चौंक जाएंगे

Mahabharat की कथा में हस्तिनापुर के महाराज धृतराष्ट्र और महारानी गांधारी के सौ पुत्रों में सबसे बड़े थे दुर्योधन। इतिहास और धर्मग्रंथों में दुर्योधन को इस महायुद्ध का सबसे बड़ा खलनायक माना गया है।

सिमरन सिंह

Duryodhana Temple: महाभारत की कथा में हस्तिनापुर के महाराज धृतराष्ट्र और महारानी गांधारी के सौ पुत्रों में सबसे बड़े थे दुर्योधन। इतिहास और धर्मग्रंथों में दुर्योधन को इस महायुद्ध का सबसे बड़ा खलनायक माना गया है। सत्ता की लालसा में उसने अधर्म का मार्ग अपनाया और पांडवों के प्रति द्वेष में कोई कसर नहीं छोड़ी। द्रौपदी चीरहरण से लेकर वनवास तक, दुर्योधन के कई निर्णय आज भी अधर्म की मिसाल माने जाते हैं।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसी दुर्योधन का एक मंदिर भारत में मौजूद है, जहां उसकी विधिवत पूजा होती है? यह तथ्य न केवल हैरान करता है, बल्कि महाभारत को देखने की हमारी सोच को भी चुनौती देता है।

केरल में स्थित है दुर्योधन का मंदिर

दुर्योधन का यह अनोखा मंदिर दक्षिण भारत के केरल राज्य के कोल्लम जिले में एक पहाड़ी पर स्थित है। स्थानीय लोगों की इस मंदिर के प्रति गहरी आस्था है। खास बात यह है कि इस मंदिर के आसपास लगभग 50 किलोमीटर के दायरे में कई ऐसे स्थान हैं, जहां 99 कौरवों, उनकी बहन दुशाला और मामा शकुनि का भी पूजन किया जाता है। यह परंपरा केरल की लोक-आस्थाओं और मान्यताओं से जुड़ी हुई है।

लोककथा से जुड़ा है मंदिर का इतिहास

एक प्रसिद्ध लोककथा के अनुसार, महाभारत काल में जब पांडव अज्ञातवास में थे, तब दुर्योधन उन्हें खोजते हुए केरल के घने जंगलों तक पहुंच गया। इसी दौरान वह कोल्लम जिले के मलनाडा गांव में रुका। यहां के एक आदिवासी मुखिया ने उसकी पूरी निष्ठा से सेवा की, उसे भोजन कराया और विश्राम की व्यवस्था की।

आदिवासी मुखिया के सेवाभाव से दुर्योधन अत्यंत प्रसन्न हुआ और उसने गांव को जमीन दान में दी। बाद में उसी स्मृति में यहां दुर्योधन का मंदिर बनाया गया, जिसे आज मलनाडा मंदिर के नाम से जाना जाता है। स्थानीय लोग दुर्योधन को एक दयालु और न्यायप्रिय व्यक्ति के रूप में पूजते हैं और स्नेह से उसे “अप्पूपा” यानी दादाजी कहते हैं।

बिना मूर्ति का मंदिर, फिर भी गहरी आस्था

इस मंदिर की सबसे अनोखी बात यह है कि यहां दुर्योधन की कोई मूर्ति नहीं है। मंदिर में केवल एक चबूतरा है, जहां श्रद्धालु ध्यान और पूजा करते हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब दुर्योधन इस गांव से गया था, वह दिन शुक्रवार था। उसने कहा था कि वह अगले शुक्रवार को लौटेगा, लेकिन वह कभी वापस नहीं आया। मान्यता है कि उसकी आत्मा यहां लौटी, जिसके बाद गांव वालों ने उसका अंतिम संस्कार किया। इसी कारण हर शुक्रवार को यहां विशेष पूजा होती है और बड़ी संख्या में भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

डिस्क्लेमर: यहां दी गई सभी जानकारियां सामाजिक और धार्मिक आस्थाओं पर आधारित हैं।

आज की ताजा खबर 21 अगस्त LIVE: एक क्लिक में पढ़ें दिनभर की सारी बड़ी खबरें

जंतर-मंतर पर आरक्षण के खिलाफ प्रदर्शन पर पुलिस का एक्शन, RAF ने प्रदर्शनकारियों को खदेड़ा, कई हिरासत में

RSS-ISI सीक्रेट मीटिंग! आंबेडकर ने PM मोदी और भागवत से पूछे सवाल, कोलंबो बैठक के 4 मुद्दों के खुलासे की मांग

असम बाढ़ पर CM हिमंता की वित्त मंत्री से अहम मुलाकात, निर्मला सीतारमण ने दिया केंद्र के सहयोग का भरोसा

Japan Delegation Varanasi: 109 सदस्यीय जापानी प्रतिनिधिमंडल पहुंचा काशी, निवेश और संस्कृति को मिलेगी नई उड़ान