हिंदी दिवस (सोर्स- सोशल मीडिया)
भारत की आजादी के सबसे बड़े नायक महात्मा गांधी गुजराती भाषी थे। वह अंग्रेजी के अच्छे जानकार भी थे। लेकिन आंदोलन के दौरान वह लोगों के सामने हिंदी में ही अपनी बात रखते थे। वे हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के पक्षधर रहे।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर मराठी भाषी थे। हालांकि उन्हें संघ के जरिए अपनी बात लोगों तक पहुंचाने का माध्यम हिंदी को बनाया। वह हिंदी को विश्वभाषा बनाने के समर्थक थे, 1950 में हरियाणा में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने इसका जिक्र किया था।दयानंद सरस्वती ने अपने सबसे प्रमुख ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश की भाषा हिंदी रखी थी। जबकि इस दौर में संस्कृत के साथ-साथ देशज बोलियों का चलन था। दयानंद सरस्वती स्वयं गुजराती भाषी थे। उन्हें संस्कृत का भी अच्छा ज्ञान था। फिर भी उन्होंने आर्य समाज के प्रचार-प्रसार का जरिया हिंदी को ही बनाया। आजाद हिंद फौज के संस्थापक सुभाष चंद्र बोस बंगाली भाषी थे। बोस हिंदी पढ़-लिख और बोल सकते थे, लेकिन वह इसे बोलने में हिचकते थे। हालांकि जब वह 1938 में कांग्रेस के अध्यक्ष बने,तो उन्हें तय किया कि वह लोगों से हिंदी में ही संवाद करेंगे। इसके लिए उन्होंने हिंदी के एक शिक्षक को भी अपने साथ रखा था। इसके बाद उन्होंने अपने कई वक्तव्य हिंदी में दिए थे। सुभाष चंद्र बोसने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने पर खूब जोर दिया था, उनका मानना था कि जिस देश की अपनी राष्ट्रभाषा नहीं होती वह खड़ा नहीं हो सकता। बाबूराव विष्णु पराडकर मराठी भाषी थे, वे कोलकाता नेशनल कॉलेज में हिंदी और मराठी पढ़ाते थे। हिंदी पत्रकारिता में उन्होंने अहम योगदान दिया है। उन्होंने देशेर कथा पुस्तक का हिंदी में अनुवाद किया था। उनके सहयोग से ही दैनिक आज का प्रकाशन हुआ। पराडकर ने ही हिंदी को पत्रकारिता की भाषा बनाया।कन्हैया लाल माणिकलाल मुंशी गुजराती भाषी थे, उन्होंने मुंबई में भारतीय विद्या भवन की स्थापना की थी। माणिकलाल मुंशी ने श्रीकृष्ण, कुंती, युधिष्ठिर, पितामह भीष्म, द्रौपदी के जीवन चरित्र को हिंदी में लिखा। वह बाल्मीकि रामायण का भी हिंदी में अनुवाद करना चाहते थे। वे हिंदी को राष्ट्रभाषा दिलाए जाने के पक्षधर थे।