अमिताभ बच्चन की यादगार फिल्में (सौ. सोशल मीडिया)
जंजीर (1973): इस फिल्म ने बॉलीवुड को उसका पहला 'एंग्री यंग मैन' (Angry Young Man) दिया। इंस्पेक्टर विजय के रूप में अमिताभ ने उस दौर के रोमांटिक हीरो के ट्रेंड को तोड़कर एक नए एक्शन जॉनर की शुरुआत की।दीवार (1975): यश चोपड़ा की इस फिल्म ने 'एंटी-हीरो' का नया मानदंड स्थापित किया। एक ग्रे-शेड क्रिमिनल कैरेक्टर (विजय) होने के बावजूद, अमिताभ ने अपनी अदाकारी से पूरे देश की सहानुभूति बटोर ली। इसके डायलॉग्स आज भी हर किसी की ज़ुबान पर हैं।
शोले (1975): भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी और हमेशा याद रखी जाने वाली 'मसाला फिल्म'। 'जय' के शांत पर दमदार किरदार में अमिताभ ने दोस्ती और एक्शन की परिभाषा बदल दी।अमर अकबर एंथनी (1977): मनमोहन देसाई की इस फिल्म ने कमर्शियल सिनेमा में 'खोए-पाए भाई' (Lost and Found) के फॉर्मूले और सांप्रदायिक सौहार्द को बेहद मनोरंजक तरीके से पेश किया। एंथनी गोंसाल्विस का किरदार अमिताभ के बेहतरीन कॉमेडी रोल्स में से एक है।
डॉन (1978): इस फिल्म ने बॉलीवुड के क्राइम-थ्रिलर जॉनर को एक नया और स्टाइलिश रूप दिया। एक चालाक डॉन और एक भोले-भाले विजय के डबल रोल को अमिताभ ने जिस परफेक्शन के साथ निभाया, उसने उनके स्टार-पावर को चरम पर पहुंचा दिया।अग्निपथ (1990): मुकुल एस. आनंद की इस फिल्म में अमिताभ ने अपनी आवाज़ के भारीपन और 'विजय दीनानाथ चौहान' के किरदार से एक नया बेंचमार्क सेट किया। इस दमदार एक्शन-ड्रामा के लिए उन्हें अपना पहला नेशनल अवार्ड मिला।ब्लैक (2005): संजय लीला भंसाली की इस फिल्म ने दिखाया कि अमिताभ अपने 60 के दशक में भी कैरेक्टर-ड्रिवन (किरदार-प्रधान) फिल्मों से पूरे सिनेमा को लीड कर सकते हैं। एक अंधी-बहरी लड़की के अल्जाइमर से पीड़ित टीचर (देबराज सहाय) के रूप में उनकी एक्टिंग बेमिसाल थी।
पा (2009): आर. बाल्की की इस फिल्म में उन्होंने प्रोजेरिया (Progeria) बीमारी से पीड़ित 12 साल के बच्चे 'ऑरो' का किरदार निभाया। इस गजब के फिजिकल ट्रांसफॉर्मेशन और बेहतरीन एक्टिंग के लिए उन्हें एक और नेशनल अवार्ड मिला।पीकू (2015): शूजित सरकार की इस स्लाइस-ऑफ-लाइफ फिल्म में उन्होंने एक तनाव-ग्रस्त, थोड़े ज़िद्दी और कब्ज (Constipation) से परेशान एक बुजुर्ग पिता (भास्कर बनर्जी) का किरदार निभाया। यह फिल्म साबित करती है कि अमिताभ हमेशा बदलते सिनेमा के साथ खुद को ढाल सकते हैं।
पिंक (2016): इस लीगल-थ्रिलर फिल्म ने मॉडर्न इंडियन सोसाइटी में "नो मीन्स नो" (No means No) के महत्व को सामने लाया। एक रिटायर्ड और मानसिक बीमारी से जूझते वकील के रूप में अमिताभ बच्चन की परफॉर्मेंस ने कोर्टरूम ड्रामा की परिभाषा बदल दी।