Why Gandhi Chose Sewagram Wardha: राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती के अवसर पर देश उनके विचारों और सत्याग्रह के प्रयोगों को याद कर रहा है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि साबरमती आश्रम छोड़ने के बाद बापू ने देश के हृदय स्थल यानी महाराष्ट्र के वर्धा स्थित 'सेवाग्राम' को ही अपना नया मुख्य केंद्र क्यों चुना था? आइए जानते हैं इस ऐतिहासिक फैसले के पीछे की पूरी कहानी।
मार्च 1930 में जब महात्मा गांधी दांडी नमक सत्याग्रह के लिए निकले, तो उन्होंने एक कठोर संकल्प लिया था कि जब तक भारत को पूर्ण स्वराज यानी पूर्ण स्वतंत्रता नहीं मिल जाती, वे साबरमती आश्रम में वापस कदम नहीं रखेंगे। गोलमेज सम्मेलन की विफलता और सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौर के बाद बापू अपने सामाजिक व ग्रामीण पुनरुद्धार आंदोलनों के लिए एक नया मुख्यालय खोज रहे थे।
भारत का भौगोलिक केंद्र: वर्धा और सेवाग्राम देश के मध्य में स्थित थे, जिससे देश के सभी हिस्सों से संवाद और पहुंच आसान थी।
जमनालाल बजाज का सहयोग: गांधी जी के करीबी सहयोगी और उद्योगपति सेठ जमनालाल बजाज ने वर्धा में अपनी भूमि, भवन और फलदार वृक्षों से युक्त विशाल जमीन दान में देने की पेशकश की थी।
प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं का आधार: वर्धा में आचार्य विनोबा भावे और उनके समर्पित सत्याग्रही कार्यकर्ताओं की एक टीम पहले से ही ग्रामीण कार्यों के लिए तैयार थी।
ग्रामीण उद्योगों का पुनरुद्धार: गांधी जी का मानना था कि गुजरात का माहौल उस समय अधिक व्यापारिक हो गया था, जबकि वर्धा आधा गांव और आधा शहर होने के कारण ग्रामीण उद्योगों और खादी के पुनरुद्धार के लिए सबसे उपयुक्त स्थान था।
वर्ष 1936 में बापू की शिष्या मीराबेन (मेडलीन स्लेड) वर्धा से 5 मील दूर स्थित सेवाग्राम पहुंचीं। उन्होंने स्थानीय बांस, मिट्टी और लकड़ी का उपयोग करके 5 मील के दायरे में मिलने वाली सामग्री से बापू के लिए एक सादी कुटिया (बापू कुटी) बनाई। बाद में डाक की गफलत से बचने के लिए 1940 में इस गांव का नाम बदलकर 'सेवाग्राम' रखा गया।
1936 से लेकर अपने अंतिम दिनों तक सेवाग्राम ही महात्मा गांधी की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा। यहीं से उन्होंने 'अखिल भारतीय ग्रामोद्योग संघ' और 'नयी तालीम' जैसे क्रांतिकारी प्रयोग चलाए। मिट्टी की इस छोटी सी कुटिया से बापू ने पूरे ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दी और देश के स्वतंत्रता आंदोलन का संचालन किया।