मुगल बादशाह औरंगजेब सोर्स: सोशल मीडिया
महाराष्ट्र

औरंगजेब का पतन: दिल्ली का तख्त और 5 लाख की फौज... फिर क्यों महाराष्ट्र की मिट्टी बन गई मुगल सल्तनत की कब्रगाह?

Aurangzeb And Mughal Empire Downfall History: 5 लाख की फौज और दिल्ली के तख्त के बावजूद औरंगजेब का दक्कन अभियान मुगल साम्राज्य के आर्थिक दिवालियापन और पतन की सबसे बड़ी वजह बना।

आकाश मसने

Highlights

  • औरंगजेब का जन्म 3 नवंबर 1618 को गुजरात के दाहोद में हुआ था।

  • सह्याद्रि की पहाड़ियों में मराठों की 'गनिमी कावा' नीति ने मुगल सेना को तोड़ दिया।

  • महाराष्ट्र की मिट्टी बनी औरंगजेब और मुगल सल्तनत की कब्रगाह।

Aurangzeb Deccan Campaign and Mughal-Maratha Conflict History: मुगल बादशाह मुइउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब आलमगीर का मूल्यांकन भारतीय इतिहास की सबसे जटिल बहसों में से एक है। 3 नवंबर 1618 को जन्मे औरंगजेब ने 1658 से 1707 तक शासन किया। उसके शासन में मुगल साम्राज्य का भौगोलिक विस्तार अपने चरम पर पहुंचा, लेकिन इसी दौर में उसकी प्रशासनिक, आर्थिक और सैन्य व्यवस्था पर दबाव भी बढ़ता गया। आइए जानते हैं महाराष्ट्र की मिट्टी मुगल सल्तनत की कब्रगाह क्यों बन गई? और औरंगजेब का पतन कैसे हुआ।

औरंगजेब के शासन के अंतिम 26 वर्षों का बड़ा हिस्सा दक्कन में बीता। बीजापुर और गोलकुंडा जैसे सल्तनतों को जीतने के बाद भी वह मराठा प्रतिरोध को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सका। इतिहासकार सर जदुनाथ सरकार ने अपनी पुस्तक 'History of Aurangzeb' में लिखा था कि "जिस तरह स्पेन के नासूर ने नेपोलियन को बर्बाद किया, उसी तरह दक्कन के नासूर ने औरंगजेब का अंत कर दिया।"

आर्थिक संकट: जागीरदारी व्यवस्था पर बढ़ता दबाव

मुगल साम्राज्य की प्रशासनिक और सैन्य व्यवस्था मनसबदारी तथा जागीरदारी प्रणाली पर आधारित थी। मनसबदारों को उनके पद और जिम्मेदारी के अनुसार वेतन या राजस्व वसूली के अधिकार दिए जाते थे। लेकिन औरंगजेब के शासन के अंतिम दशकों में इस व्यवस्था पर कई तरह के दबाव बढ़ने लगे।

दक्कन में बीजापुर और गोलकुंडा की विजय के बाद मुगल साम्राज्य का क्षेत्र तो बढ़ा, लेकिन नए इलाकों से नियमित राजस्व वसूलना आसान नहीं था। मराठा हमलों, स्थानीय प्रतिरोध और लगातार चल रहे सैन्य अभियानों के कारण कई क्षेत्रों में राजस्व संग्रह प्रभावित हुआ।

इतिहासकार सतीश चंद्र और एम. अथर अली ने मुगल कुलीन वर्ग में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और जागीरों की उपलब्धता के बीच असंतुलन को साम्राज्य के संकट का एक महत्वपूर्ण कारण माना। इतिहासकार जे. एफ. रिचर्ड्स ने इस संकट के दूसरे पहलुओं पर भी ध्यान दिलाया। उनके अनुसार, दक्कन में जीते गए कुछ क्षेत्रों को जागीर के रूप में बांटने के बजाय खालिसा यानी शाही नियंत्रण वाली जमीन के रूप में रखा गया, ताकि वहां से प्राप्त राजस्व का इस्तेमाल युद्धों के लिए किया जा सके।

इस व्यवस्था में समस्या यह थी कि कागजों पर तय राजस्व और वास्तव में वसूले गए राजस्व के बीच अंतर बढ़ता गया। नतीजतन मनसबदारों, सैनिकों और प्रशासनिक तंत्र पर आर्थिक दबाव बढ़ा।

मराठों की युद्ध पद्धति औरंगजेब के लिए बड़ी चुनौती

औरंगजेब परंपरागत युद्ध का उस्ताद था, जहां दो विशाल सेनाएं खुले मैदान में आमने-सामने लड़ती थीं। लेकिन सह्याद्रि की पहाड़ियों में उसका सामना एक ऐसी युद्ध पद्धति से हुआ, जिसका कोई तोड़ मुगल सेना के पास नहीं था।

मुगल सेना बड़ी संख्या में सैनिकों, घुड़सवारों, हाथियों, तोपखाने और रसद के साथ अभियान चलाती थी। खुले मैदानों में बड़ी सेनाओं के साथ युद्ध करना उसकी सबसे बड़ी ताकत थी। लेकिन दक्कन का भौगोलिक क्षेत्र और मराठों की युद्ध पद्धति उसके लिए बड़ी चुनौती बन गई।

सह्याद्रि की पहाड़ियों मराठों का सामना

सह्याद्रि की पहाड़ियों, संकरे रास्तों और किलों से घिरे इलाकों में भारी सैन्य जमावड़े के साथ आगे बढ़ना मुश्किल था। इसके उलट मराठा घुड़सवार तेजी से एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंच सकते थे। वे मुगल सेना की रसद व्यवस्था, चौकियों और संचार मार्गों को निशाना बनाते थे और फिर पहाड़ी क्षेत्रों में लौट जाते थे।

औरंगजेब के दरबार में पहुंचे छत्रपति शिवाजी महाराज का चित्र

क्या है गनिमी कावा?

मराठों की इस युद्ध पद्धति को सामान्य तौर पर 'गनिमी कावा' कहा जाता है। गनिमी कावा छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा विकसित एक प्रसिद्ध छापामार युद्धनीति थी। इसमें अचानक हमला, तेजी से स्थान बदलना और दुश्मन की कमजोरियों का फायदा उठाना महत्वपूर्ण था।

मुगल सेना के सामने एक और समस्या किलों पर कब्जे को बनाए रखने की थी। किसी किले को जीतने के लिए लंबी घेराबंदी करनी पड़ती थी। लेकिन किला जीतने के बाद भी आसपास के इलाके पर स्थायी नियंत्रण बनाए रखना आसान नहीं था। मराठा सेना कई बार मुगल चौकियों और कब्जे वाले क्षेत्रों पर दोबारा हमले करती थी।इस तरह मुगल सेना को केवल युद्ध जीतने के लिए नहीं, बल्कि जीते हुए क्षेत्रों की सुरक्षा और रसद बनाए रखने के लिए भी लगातार संसाधन खर्च करने पड़ते थे।

संभाजी महाराज की मृत्यु के बाद भी जारी रहा मराठा प्रतिरोध

1689 में औरंगजेब की मुगल सेना ने छत्रपति शिवाजी महाराज के बेटे छत्रपति संभाजी महाराज को बंदी बनाकर यातानाएं दी और उनकी हत्या कर दी। औरंगजेब को लेगा कि संभाजी महाराज की मृत्यु के बाद मराठा कमजोर हो जाएंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

संभाजी महाराज के बाद राजाराम महाराज ने मराठा साम्राज्य का नेतृत्व संभाला। मुगल दबाव के बीच वे दक्षिण भारत के जिंजी किले तक पहुंचे और वहां से प्रतिरोध जारी रखा। बाद के वर्षों में महारानी ताराबाई ने मराठा सत्ता और सैन्य अभियान का नेतृत्व किया।

संताजी घोरपड़े और धनाजी जाधव जैसे सेनानायकों ने अलग-अलग मोर्चों पर मुगल सेना को चुनौती दी। मराठा प्रतिरोध किसी एक राजधानी या एक सैन्य केंद्र तक सीमित नहीं रहा। अलग-अलग सरदारों और स्थानीय शक्ति केंद्रों ने मुगल सेना के लिए चुनौती बनाए रखी।

दक्कन का युद्ध मुगल साम्राज्य के लिए महंगा क्यों साबित हुआ?

दक्कन के अभियानों में औरंगजेब की मुगल सेना को लंबे समय तक सैनिकों, घोड़ों, हाथियों, तोपखाने और रसद की व्यवस्था बनाए रखनी पड़ी। उत्तर भारत से दूर सैन्य अभियान चलाने के कारण आपूर्ति और प्रशासनिक नियंत्रण की लागत भी बढ़ी।

अमेरिकी सैन्य इतिहासकार एरिक डब्ल्यू. ऑसबोर्न ने अपने शोध लेख 'The Ulcer of the Mughal Empire: Mughals and Marathas, 1680-1707' में दक्कन के संघर्ष को मुगल साम्राज्य की कमजोर होती नींव से जोड़ा है। उनके अध्ययन के अनुसार, मराठों के खिलाफ लंबा युद्ध मुगल साम्राज्य की सैन्य और राजनीतिक स्थिति को कमजोर करने वाले प्रमुख कारकों में था।

इतालवी लेखक निकोलाओ मनूची का आंखों देखा हाल

17वीं शताब्दी के एक प्रसिद्ध इतालवी लेखक निकोलाओ मनूची ने 1700 के दशक की शुरुआत में मुग़ल शिविर की बदहाली का वर्णन करते हुए लिखा है कि "बादशाह (औरंगजेब) बूढ़ा हो चुका है, उसकी सेना पूरी तरह हताश है। हर साल दक्कन में प्लेग, भुखमरी और मराठों के हमलों से एक लाख से अधिक सैनिक और जानवर मर रहे हैं। मुग़ल सेनापति अंदर ही अंदर मराठों से गुप्त संधियां कर रहे हैं ताकि उनके इलाकों से रसद गुजर सके। दिल्ली अब सिर्फ एक सपना रह गई है।"

खुल्दाबाद में स्थित औरंगजेब की कब्र

औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य का क्या हुआ?

3 मार्च 1707 को महाराष्ट्र के अहमदनगर में औरंगजेब की मृत्यु हुई। उसे खुलदाबाद में एक साधारण खुली कब्र में दफनाया गया। उसकी कब्र का सादापन इतिहास में अक्सर चर्चा का विषय रहा है। औरंगजेब की मृत्यु के साथ मुगल साम्राज्य तत्काल समाप्त नहीं हुआ। उसके बाद उत्तराधिकार का संघर्ष शुरू हुआ और केंद्रीय सत्ता धीरे-धीरे कमजोर होती गई।

औरंगजेब के पतल के मुख्य कारण

अगर हम औरंगजेब और मुगल साम्राज्य के पतन को कम शब्दों में समझे तो इसके कुछ प्रमुख कारण रहे। 25 वर्षों तक लाखों की सेना को युद्ध में झोंके रखने के कारण शाही खजाना पूरी तरह खाली हो गया। उत्तर भारत से आने वाला सारा राजस्व इसी युद्ध की भेंट चढ़ गया। वहीं दूसरी ओर औरंगजेब के लगातार उत्तर भारत से दूर रहने के कारण दिल्ली और आगरा का प्रशासन ठप हो गया। जगह-जगह विद्रोह होने लगे और सूबेदार स्वतंत्र होने लगे।

साथ ही मुगल सेना आमने-सामने के भारी युद्ध के लिए प्रशिक्षित थी, जबकि मराठा बिजली की गति से हमला कर गायब हो जाते थे। इस छापामार युद्ध ने मुगल सेना का मनोबल तोड़ दिया। इसी वजह से दक्कन आनी आज के महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में औरंगजेब और मुगल सल्तनत कमजोर होते गए और उसका पतन हुआ।

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