सातारा जिले के वाई तालुका में स्थित पांडे गांव में खड़े रहकर नवरात्रि व्रत की परंपरा।
पांडे गांव की यह परंपरा करीब साढ़े तीन सौ साल पुरानी है।
व्रत रखने वाले भक्त 9 दिनों तक जमीन पर नहीं बैठते, जूते-चप्पल नहीं पहनते।
रात में रस्सियों से बने झूले से छाती टिकाकर खड़े-खड़े ही आराम करते हैं।
Pande Village Ubhyache Navratri Tradition: नवरात्रि का पावन पर्व 11 अक्टूबर से शुरू हो चुका है। नवरात्रि शुरू होते ही पूरे देश में गांव से लेकर महानगरों तक एक अलग ही माहौल देखने को मिलता है। कहीं देवी के मंदिरों में सुबह से ही लंबी कतारें लग जाती हैं, तो कहीं भजन-कीर्तन गूंजने लगते हैं। वहीं कुछ जगहों पर देवी की पालकी पूरे गांव में निकाली जाती है।
हर घर में 'घटस्थापना' की जाती है, दीपक जलाया जाता है और नौ दिनों तक देवी की पूजा-अर्चना होती है। लेकिन, महाराष्ट्र में एक ऐसा गांव भी है जहां नवरात्रि के दौरान कुछ भक्त पूरे नौ दिनों तक जमीन पर नहीं बैठते। इतना ही नहीं, वे अपने रोजमर्रा के सभी काम खड़े रहकर ही करते हैं और यहां तक कि सोते भी खड़े-खड़े ही हैं।
हम बात कर रहे है सातारा जिले के वाई तालुका में स्थित पांडे गांव की। पुणे-बेंगलुरु हाईवे के पास, बोपेगांव से लगभग चार किलोमीटर दूर बसे पांडे गांव की आबादी करीब 2,500 है। यहां के मुख्य देवता कालभैरवनाथ हैं।
कालभैरवनाथ देवता के प्रति गहरी आस्था के कारण, गांव वाले एक परंपरा का पालन करते हैं जिसे 'उभ्याचे नवरात्रि' (खड़े रहकर मनाई जाने वाली नवरात्रि) कहा जाता है। जानकारी के अनुसार, यह परंपरा लगभग 350 सालों से चली आ रही है। आधुनिकता के दौर में भी गांव ने अपनी इस अनोखी संस्कृति को आज भी संजोकर रखा है।
नवरात्रि शुरू होने से पहले ही गांव वाले एक साथ इकट्ठा हो जाते हैं। मंदिर परिसर और गांव की सार्वजनिक जगहों की साफ-सफाई की जाती है और त्योहार की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। घटास्थापना के दिन गांव वाले सुबह जल्दी स्नान करके मंदिर पहुंचते हैं और प्रार्थना करते हैं। गांव में एक सींग की आवाज गूंजती है, जो लोगों को एक साथ बुलाती है।
इसके बाद कालभैरवनाथ की पूजा की जाती है और पालकी तैयार की जाती है। इस तरह नौ दिनों के इस व्रत/अनुष्ठान की शुरुआत होती है। यह व्रत वे भक्त रखते हैं जिन्होंने कालभैरवनाथ के सामने कोई मन्नत मांगी होती है।
घटास्थापना के दिन से लेकर विजयादशमी तक उन्हें कुछ तय नियमों का सख्ती से पालन करना होता है। इन नियमों में जमीन पर न बैठना, जूते-चप्पल न पहनना, गांव की सीमा से बाहर न जाना और ज्यादा से ज्यादा समय खड़े रहकर बिताना शामिल है। चलते समय, भक्त सहारे के लिए एक लाठी साथ रखते हैं, यह लाठी न केवल चलने में मदद करती है, बल्कि उन्हें उनके व्रत के नियमों की लगातार याद भी दिलाती रहती है।
इस व्रत दौरान भक्तों का आराम करने का तरीका भी बहुत अनोखा है। मंदिर में रस्सियों की मदद से एक झूले जैसी व्यवस्था बनाई जाती है। भक्त अपनी छाती को इस झूले से टिकाकर थोड़ा आराम कर लेते हैं।
बताया जाता है कि नियम के अनुसार, आराम करते समय भी एक पैर जमीन पर टिका रहना चाहिए। यहां तक कि दोपहर का खाना या नाश्ता करने के लिए घर जाने पर भी बैठने की मनाही होती है। भक्तों को खाना भी खड़े-खड़े ही खाना पड़ता है, और उसके तुरंत बाद वापस मंदिर लौटना होता है।
सातारा के पांडे गांव में नवरात्रि के दौरान व्रत करने वाले भक्तों पर खान-पान को लेकर भी पाबंदियां होती हैं। जानकारी के अनुसार, इस समय तीखे मसालेदार भोजन और नमक से परहेज किया जाता है, और इसकी जगह सादा व हल्का भोजन, फल, दूध या मिठाइयां ली जाती हैं।
पांडे गांव में नवरात्रि पर्व सामूहिक आस्था से जुड़ा एक उत्सव है। रिपोर्टों के अनुसार, हर साल गांव के लगभग 350 से 400 श्रद्धालु इस कठिन व्रत का पालन करते हैं। नवरात्रि के दौरान पांडे गांव में रातें पारंपरिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों से भरी होती हैं, जिनमें भजन, कीर्तन, गोंधल और वाघ्या-मुरली परंपरा शामिल हैं। अष्टमी के दिन देवता के लिए जागरण का आयोजन किया जाता है।
नवमी के दिन भविष्य के लिए मन्नतें मांगने हेतु देवता से मार्गदर्शन लेने की एक परंपरा है, जिसे 'कौल' कहा जाता है। इस तरह, जैसे ही मौजूदा नवरात्रि का व्रत संपन्न होता है, अगले साल की आस्था और संकल्पों की तैयारियां शुरू हो जाती हैं।
'कौल' (दैवीय मार्गदर्शन) लेने की एक रस्म के जरिए यह तय किया जाता है कि सीमोल्लंघन यानी गांव की सीमा को पार करने की प्रतीकात्मक प्रक्रिया किस दिशा में की जाएगी। इसके बाद, लोग गांव की सीमा तक उसी दिशा में जाते हैं और 'सोना लूटने' की परंपरा निभाते हैं।
महाराष्ट्र के कई हिस्सों में, दशहरा के दिन सोने के प्रतीक माने जाने वाले आपटा के पत्ते बांटने की प्रथा है। दशहरे के दिन पूजा-अर्चना के बाद शाम को लोग एक-दूसरे को सोना यानी आपटा के पत्ते देते हैं और बड़े बुजुर्गों से आशीर्वाद लेते हैं।
सातारा जिले के पांडे गांव की इस परंपरा पर विचार करते हुए एक सवाल उठता है कि आखिर इतने कठिन व्रत को करने का निर्णय लेने के पीछे क्या कारण होता है? इसका जवाब हर भक्त के अपने निजी अनुभव के आधार पर अलग-अलग हो सकता है। हो सकता है कि किसी ने अपनी कोई विशेष इच्छा पूरी होने की उम्मीद में संकल्प लिया हो; किसी ने संकट से बाहर निकलने के लिए ईश्वर की शरण ली हो; या फिर कुछ लोगों के लिए यह उनके परिवार या गांव से चली आ रही आस्था की एक परंपरा हो।