

Chhatrapati Shivaji Maharaj Kuldevi Tulja Bhavani Temple History: महाराष्ट्र के धाराशिव जिले में यमुनांचल पर्वत पर स्थित श्री तुलजा भवानी मंदिर राज्य के प्रसिद्ध साढ़े तीन शक्तिपीठों में से एक पूर्ण शक्तिपीठ माना जाता है। यह पावन धाम न केवल एक महान धार्मिक केंद्र है, बल्कि मराठा साम्राज्य के गौरवशाली इतिहास और करोड़ों श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का प्रतीक है।
इस पावन धाम के प्राकट्य से जुड़ी एक अत्यंत भावपूर्ण पौराणिक कथा प्रचलित है। कृत युग में ऋषि कर्दम और उनकी पतिव्रता पत्नी अनुभूति मंदाकिनी नदी के तट पर निवास करते थे। ऋषि कर्दम के देहावसान के बाद, अनुभूति अपने छोटे पुत्र के संरक्षण और कल्याण के लिए वन में गहन तपस्या में लीन हो गईं। इसी दौरान कूकर नामक एक दुष्ट राक्षस ने उनकी सुंदरता पर मोहित होकर उन पर अत्याचार करने का दुष्प्रयास किया।
अत्यंत विकट परिस्थिति में अनुभूति ने जगदंबा देवी से अपनी रक्षा की आर्त पुकार लगाई। भक्त की पुकार सुनते ही देवी माता अत्यंत त्वरित गति से प्रकट हुईं और उस असुर पर टूट पड़ीं। युद्ध के दौरान कूकर राक्षस ने भैंसे का रूप धारण कर लिया, जिसके बाद मां ने उसका वध कर महिषासुरमर्दिनी का रूप धारण किया और यह विजय पर्व विजयादशमी कहलाया। भक्त की रक्षा हेतु पलक झपकते ही सहायता करने के कारण देवी मां त्वरिता कहलाईं, जो मराठी भाषा में आगे चलकर तुलजा और बाद में तुलजा भवानी नाम से विख्यात हुईं।
मां तुलजा भवानी छत्रपति शिवाजी महाराज और भोसले राजवंश की आराध्य कुलदेवी हैं। इतिहास और जनश्रुतियों के अनुसार, शिवाजी महाराज किसी भी महत्वपूर्ण सैन्य अभियान या युद्ध से पहले मां भवानी के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त करते थे। मान्यता है कि स्वयं मां भवानी ने छत्रपति शिवाजी महाराज को हिंदवी स्वराज्य की स्थापना के लिए दिव्य 'भवानी तलवार' प्रदान की थी।
चलायमान स्वरूप: काले शालीग्राम पाषाण से निर्मित माता की आठ हाथों वाली अष्टभुजा मूर्ति मंदिर में स्थायी रूप से जड़ित न होकर 'चलायमान' है। वर्ष में तीन बार इस दिव्य मूर्ति को सिंहासन से उतारकर मंदिर परिसर में पालकी यात्रा निकाली जाती है।
चमत्कारी चिंतामणि पत्थर: मंदिर परिसर में एक दुर्लभ चिंतामणि पत्थर मौजूद है, जिसके विषय में माना जाता है कि यह श्रद्धालुओं के प्रश्नों का उत्तर सांकेतिक रूप में देता है। यदि प्रश्न का उत्तर हां हो तो यह पत्थर स्वतः दाहिनी ओर और यदि ना हो तो बाईं ओर मुड़ जाता है। छत्रपति शिवाजी महाराज भी युद्ध नीति के संदर्भ में यहाँ मार्गदर्शन प्राप्त करते थे।
कल्लोल तीर्थ: परिसर में स्थित इस पवित्र जल कुंड में 108 तीर्थों का पवित्र जल सम्मिश्रित माना जाता है।
हेमाडपंथी स्थापत्य कला में निर्मित इस मंदिर परिसर में दो प्रमुख महाद्वार राजे शहाजी महाद्वार और राजमाता जिजाऊ महाद्वार स्थित हैं। यहां शारदीय नवरात्रि के दौरान विशाल मेले का आयोजन होता है, जिसमें गोंधल, जागरण और महापूजा के लिए देश भर से लाखों श्रद्धालु उमड़ते हैं।