Sanjay Raut Attacks BJP Over Operation Tiger: महाराष्ट्र की राजनीति में ऑपरेशन टाइगर की सुगबुगाहट ने सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। उद्धव ठाकरे गुट के कुछ और सांसदों के टूटने की खबरों के बीच शिवसेना (UBT) के दिग्गज नेता और राज्यसभा सांसद संजय राउत का गुस्सा सातवें आसमान पर है। दिल्ली में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जहां एक ओर राजाभाऊ वाजे जैसे निष्ठावान नेता अपनी आंखों के आंसू नहीं रोक पाए, वहीं दूसरी ओर संजय राउत ने बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए केंद्र सरकार और भाजपा पर तीखे प्रहार किए।
प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद बागी सांसदों की चर्चा पर अपना आपा खोते हुए राउत ने मीडिया के सामने एक ऐसा बयान दिया है, जिसने सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग को और तेज कर दिया है।
संजय राउत ने भाजपा की विस्तारवादी नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि उनके पास संसद में पहले से ही पर्याप्त बहुमत है, फिर भी अन्य दलों को तोड़ने की उनकी भूख शांत नहीं हो रही है। उन्होंने भाजपा की इस कार्यशैली की तुलना एक नशे से की। राउत ने तंज कसते हुए पूछा कि क्या भाजपा को अब राजनीतिक पार्टियां फोड़ने की लत लग गई है? उनके अनुसार, सत्ता पक्ष का यह व्यवहार लोकतंत्र के लिए एक खतरनाक संकेत है।
मीडिया से मुखातिब होते हुए राउत ने उन तमाम पार्टियों की फेहरिस्त गिनाई, जिन्हें पिछले कुछ समय में अस्थिर करने की कोशिश की गई। उन्होंने कहा कि पहले आम आदमी पार्टी को निशाना बनाया गया, फिर शिवसेना को एक बार पहले ही तोड़ दिया गया और उसके बाद एनसीपी (राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी) के भी दो फाड़ कर दिए गए। अब एक बार फिर तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना के बचे हुए गुट को तोड़ने की कोशिशें की जा रही हैं।
राउत ने सरकार को नसीहत देते हुए कहा, इस देश में लोकतंत्र है और देश संविधान से चलता है। आपको पार्लियामेंट में और कितना बहुमत चाहिए? थोड़ा तो संयम रखिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि जिस तरह से विपक्षी दलों को कमजोर करने के लिए 'ऑपरेशन' चलाए जा रहे हैं, वह लोकतांत्रिक मर्यादाओं के खिलाफ है।
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ठाकरे गुट के भीतर इस समय भावनाओं का ज्वार उमड़ रहा है। एक तरफ संजय राउत का यह आग-बबूला अवतार है, तो दूसरी तरफ पार्टी के प्रति समर्पण दिखाने वाले सांसदों का भावुक चेहरा। राउत का यह बयान न केवल भाजपा के प्रति उनके आक्रोश को दर्शाता है, बल्कि यह उनकी हताशा को भी बयां करता है कि कैसे एक-एक करके उनके साथी उन्हें छोड़कर जा रहे हैं।
तमाम स्थानीय छोटे और बड़े पक्षों को बैसाखियों पर लाकर एनडीए अपना एकतरफा राज स्थापित कर रही है। उद्धव ठाकरे की शिवसेना एक बार पहले ही टूट चुकी है और इस बार फिर से टूटने की कगार पर है। अब एनडीए या कहें भाजपा की ये विस्तारवादी नीति उन्हें कहां तक लेकर जाती है यह तो वक्त ही बताएगा।