Pune Silence Zone Noise Pollution: पुणे में सांस्कृतिक और शैक्षणिक राजधानी पुणे में अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों और अन्य संवेदनशील इलाकों को 'साइलेंस जोन' (शांत क्षेत्र) घोषित किया गया है। इन क्षेत्रों में वाहनों के हॉर्न बजाने और तेज आवाज पर सख्त पाबंदी है। इसके बावजूद जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट नजर आ रही है। पुणे महानगर पालिका (पीएमसी) की ताजा पर्यावरण सद्यःस्थिति रिपोर्ट में यह चिंताजनक खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय परिसर में ध्वनि का स्तर 77 डेसिबल तक पहुंच गया है। वहीं, नायडू अस्पताल परिसर में 52.5 से 69.3 डेसिबल तक शोर दर्ज किया गया।
ये आंकड़े साफ दर्शाते हैं कि शहर के साइलेंस जोन से भी शांति पूरी तरह गायब हो चुकी है। मनपा की पर्यावरण विषयक विशेष मुख्य सभा में पर्यावरण विभाग के उपायुक्त माधव जगताप ने यह रिपोर्ट प्रस्तुत की। इसके मुताबिक, शहर के औद्योगिक, व्यावसायिक, आवासीय और साइलेंस जोन में बढ़ता ध्वनि प्रदूषण अब बेहद गंभीर विषय बन गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, औद्योगिक क्षेत्रों में दिन के समय ध्वनि की निर्धारित सीमा 75 डेसिबल तय है, लेकिन कई स्थानों पर यह 78 डेसिबल तक दर्ज की गई।। व्यावसायिक क्षेत्रों में निर्धारित सीमा 65 डेसिबल है, जबकि यहां अधिकतम स्तर 76 डेसिबल तक पहुंच गया।
आवासीय इलाकों की स्थिति भी चिंताजनक है। शहर की व्यस्त सड़कों पर ध्वनि का स्तर 75 डेसिबल से अधिक दर्ज हुआ है, जिससे स्पष्ट है कि अनियंत्रित यातायात का सीधा असर रिहायशी इलाकों के वातावरण पर पड़ रहा है।
साइलेंस जोन में मरीजों और विद्यार्थियों को शांत वातावरण जरूरी है। इसके बावजूद विश्वविद्यालय परिसर में 77 डेसिबल का शोर होना बेहद गंभीर है, जो व्यावसायिक क्षेत्रों के शोर से भी अधिक है। नायडू अस्पताल के आसपास 'साइलेंस जोन' और 'हॉर्न न बजाएं' के बोर्ड लगे होने के बाद भी नियमों का पालन नहीं हो पा रहा है।
पुणे मनपा की रिपोर्ट में ध्वनि प्रदूषण बढ़ने के मुख्य कारण वाहनों की तेजी से बढ़ती संख्या, बेवजह हॉर्न बजाना, ट्रैफिक जाम, निर्माण कार्य, लाउडस्पीकर और उत्सवों में ध्वनिवर्धकों का अनियंत्रित उपयोग बताए गए हैं। ट्रैफिक में फंसे वाहन चालकों द्वारा बार-बार हॉर्न बजाने से साइलेंस जोन का मूल उद्देश्य ही निष्प्रभावी हो रहा है।