Pune ICMR NIV Zika Mosquito Survey: ICMR-NIV के अध्ययन में पुणे के 128 मच्छर-पूल में से 34 में जीका वायरस RNA मिला। सर्वेक्षण 2024 के प्रकोप के दौरान 16 क्षेत्रों में किया गया था। शोध के अनुसार मच्छरों में वायरस की मौजूदगी भविष्य में संक्रमण के जोखिम की निगरानी मजबूत करने की जरूरत बताती है।
पुणे, ब्यूरो. वर्ष 2024 में जीका वायरस के प्रकोप का सामना कर चुके पुणे में मच्छरों में वायरस की मौजूदगी का खुलासा हुआ है। ICMR-राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान (NIV), पुणे के वैज्ञानिकों के अध्ययन में जांच किए गए 128 मच्छर-पूल में से 34 यानी 26.5 प्रतिशत में जीका वायरस RNA पाया गया।
यह सर्वेक्षण जून से अगस्त 2024 के दौरान पुणे मनपा क्षेत्र के 16 इलाकों में किया गया था। शोध के निष्कर्ष अगस्त 2026 में Indian Journal of Medical Research में प्रकाशित हुए हैं। अध्ययन में NIV के वैज्ञानिकों ने मच्छरों में वायरस की मौजूदगी के साथ उसके आनुवंशिक स्वरूप का भी विश्लेषण किया।
शोध के अनुसार मरीजों के घरों और आसपास करीब 400 मीटर के दायरे से वयस्क मच्छरों और लार्वा के नमूने एकत्र किए गए। कुल 577 वयस्क मच्छरों और 3,190 लार्वा को 128 समूहों में बांटकर जांच की गई।
34 पॉजिटिव पूल में 29 वयस्क Aedes aegypti, चार लार्वा पूल और एक Aedes albopictus पूल था। वारजे में 25 में से सात और धनकवड़ी में 17 में से छह पूल पॉजिटिव मिले। कोंढवा-येवलेवाड़ी में जांचे गए तीनों पूल पॉजिटिव पाए गए। एरंडवणे और येवलेवाड़ी के दो नमूनों में अपेक्षाकृत अधिक वायरल RNA मिला।
अध्ययन में बताया गया है कि जून से सितंबर 2024 के बीच पुणे में जीका के 108 मामले सामने आए थे, जिनमें 45 गर्भवती महिलाएं थीं। जीका मुख्य रूप से Aedes मच्छरों के जरिए फैलता है। गर्भावस्था के दौरान संक्रमण भ्रूण के विकास से जुड़ी गंभीर जटिलताओं का जोखिम पैदा कर सकता है।
सर्वेक्षण में 298 घरों की जांच की गई। इनमें 90 घरों में मच्छरों के प्रजनन स्थल पाए गए। हाउस इंडेक्स 30.2%, कंटेनर इंडेक्स 37.9% और ब्रेट्यू इंडेक्स 44.9% दर्ज हुआ।
प्लास्टिक ड्रम, पानी की टंकियां, धातु के ड्रम, पुराने टायर और खुले में जमा पानी मच्छरों के प्रमुख प्रजनन स्थल पाए गए।
NIV ने दो Aedes aegypti नमूनों का पूरा जीनोम विश्लेषण किया। शोध में पुणे के 2024 के जीका वायरस को एशियाई वंश से संबंधित पाया गया। कुछ आनुवंशिक बदलाव भी मिले, हालांकि अध्ययन में यह भी बताया गया कि 2015-17 के दक्षिण अमेरिकी प्रकोप से जुड़े कुछ प्रमुख न्यूरो-वायरुलेंस म्यूटेशन पुणे के नमूनों में नहीं मिले।
अध्ययन के निष्कर्षों के अनुसार मच्छरों में वायरस की मौजूदगी को देखते हुए केवल मरीजों की निगरानी पर्याप्त नहीं है। मच्छरों की नियमित निगरानी, प्रजनन स्थलों पर नियंत्रण और वायरस के आनुवंशिक बदलावों की निगरानी जारी रखना जरूरी है। शोधकर्ताओं ने भविष्य में जीका संक्रमण के जोखिम को देखते हुए निगरानी मजबूत करने पर जोर दिया है।