पार्थ पवार सुनेत्रा पवार और अजित पवार (फोटो क्रेडिट-X) 
पुणे

अजितदादा के निधन के बाद पुणे NCP में महा-विस्फोट; सुनेत्रा और पार्थ पवार के खिलाफ कार्यकर्ताओं का फूटा गुस्सा

Pune NCP Internal Rift Sunetra Parth Pawar: अजित पवार के निधन के बाद पुणे एनसीपी में भारी असंतोष। सुनेत्रा और पार्थ पवार की उदासीनता से नाराज कार्यकर्ताओं ने खोला मोर्चा।

अनिल सिंह

Pune NCP Internal Rift: पुणे नगर निगम चुनाव के ठीक बाद एक भीषण विमान हादसे में अजित पवार के असामयिक निधन ने महाराष्ट्र सहित पुणे की राजनीति को हिलाकर रख दिया था। अजितदादा के जाने के बाद पुणे एनसीपी अनाथ सी हो गई थी, क्योंकि वे ही अकेले दम पर शहर के संगठन को चलाते थे। संकट के इस दौर में जब सुनेत्रा पवार को राज्य का उपमुख्यमंत्री व पुणे का पालक मंत्री बनाया गया और पार्थ पवार को राज्यसभा भेजा गया, तब कार्यकर्ताओं को उम्मीद थी कि दादा की राजनीतिक विरासत सुरक्षित रहेगी। लेकिन साढ़े तीन महीने बढ़ने के बाद भी दोनों शीर्ष नेताओं ने पुणे के पदाधिकारियों की सुध तक नहीं ली है, जिससे जमीनी स्तर पर भारी बेचैनी है।

नेताओं की इस घोर उदासीनता का असर अब पार्टी के भीतर खुलकर विद्रोह के रूप में सामने आने लगा है। स्वीकृत पार्षदों की नियुक्ति में वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को दरकिनार किए जाने से नाराज एनसीपी के पश्चिमी मंडल के नगर अध्यक्ष सुभाष जगताप ने बगावती तेवर अपना लिए हैं। जगताप और उनके समर्थक न केवल आधिकारिक बैठकों में बाधा डाल रहे हैं, बल्कि पार्टी के आंतरिक निर्णयों को भी चुनौती दे रहे हैं। कार्यकर्ताओं का कहना है कि शहर में पार्टी को मजबूत करने के बजाय नया नेतृत्व केवल अपनी कुर्सियां संभालने में व्यस्त है।

सुनेत्रा पवार के पत्रों को मुख्यमंत्री ने रद्दी की टोकरी में डाला?

महायुति सरकार में शामिल होने के बावजूद पुणे नगर निगम में भाजपा जानबूझकर एनसीपी को कमजोर करने की रणनीति पर काम कर रही है। आरोप है कि भाजपा ने क्षेत्रीय कार्यालयों की सीमाओं का इस तरह पुनर्गठन किया है ताकि वार्ड समिति अध्यक्ष के पदों से एनसीपी को पूरी तरह दूर रखा जा सके। इस ज्यादती के खिलाफ खुद उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार ने मुख्यमंत्री को दो बार आधिकारिक पत्र लिखे, लेकिन सीएम कार्यालय की तरफ से इन पत्रों पर कोई संज्ञान नहीं लिया गया, जिससे नगर निगम के कामकाज में एनसीपी की स्थिति बेहद दयनीय हो गई है।

बीजेपी के इशारे पर विपक्ष की भूमिका से समझौता

पुणे नगर निगम की आम सभा में जब भी भाजपा किसी नीतिगत मुद्दे या घोटाले पर घिरती है, तो वह उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार के जरिए एनसीपी के स्थानीय नेताओं पर दबाव बनवाती है। पार्टी आलाकमान की किसी स्पष्ट और आक्रामक नीति के अभाव में, पुणे के एनसीपी पार्षदों को न चाहते हुए भी सदन में भाजपा के फैसलों का समर्थन करना पड़ता है। इस लाचारी के कारण जनता के बीच एनसीपी की छवि भाजपा की 'बी-टीम' जैसी बनती जा रही है, जिससे आगामी चुनावों में पार्टी को भारी नुकसान होने का अंदेशा है।

"दादा होते तो फैसला ऑन द स्पॉट होता"

पुणे के पुराने और वफादार पदाधिकारी आज अत्यंत भावुक और चिंतित हैं। तिलक भवन और स्थानीय कार्यालयों में एक ही सवाल गूंज रहा है, "अगर आज हमारे दादा होते, तो किसी की हिम्मत नहीं थी कि हमारे साथ ऐसा सौतेला व्यवहार करे। दादा ऑन द स्पॉट फैसला लेते थे, अब हम अपनी फरियाद लेकर किसके पास जाएं?" राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि सुनेत्रा और पार्थ पवार ने तुरंत पुणे का दौरा कर कार्यकर्ताओं का विश्वास नहीं जीता, तो पुणे में अजित पवार द्वारा खड़ा किया गया एनसीपी का यह मजबूत किला ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा।

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