जानिए सप्तश्रृंगी देवी मंदिर नासिक की महिमा
अठारह भुजाओं वाली सप्तश्रृंगी माता क्यों हैं खास
साथ में जानिए मार्कंडेय ऋषि और सप्तश्रृंगी शक्तिपीठ का कनेक्शन
क्यों कहा जाता है इसे 'अर्धशक्तिपीठ'
Saptashrungi Devi Temple Nashik History: नवरात्रि का पावन समय चल रहा है और चारों तरफ मां दुर्गा की भक्ति का माहौल है। भक्त अलग-अलग देवी मंदिरों और शक्तिपीठों में जाकर मां के दर्शन कर रहे हैं। ऐसे में महाराष्ट्र के नासिक जिले में स्थित 'सप्तश्रृंगी शक्तिपीठ' की बात ही अलग है। यह मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है।
यह पवित्र धाम नासिक के वणी के नंदूरी गांव में सह्याद्री पर्वतमाला की सात ऊंची चोटियों के बीच बसा हुआ है। करीब 4,800 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर की सुंदरता और धार्मिक मान्यता हर किसी को आकर्षित करती है। महाराष्ट्र की 'साढ़े तीन शक्तिपीठ' की परंपरा में इस धाम को बेहद पवित्र स्थान प्राप्त है।
महाराष्ट्र में तीन मंदिरों- तुलजापुर की तुलजा भवानी, कोल्हापुर की महालक्ष्मी और माहुर की रेणुका माता को पूर्ण शक्तिपीठ माना जाता है। वहीं सप्तश्रृंगी देवी को 'अर्धशक्तिपीठ' यानी आधा शक्तिपीठ माना जाता है। इसका कारण यह है कि यहां मां सप्तश्रृंगी देवी कुमारी यानी बालिका रूप में विराजमान हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां सप्तश्रृंगी देवी में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती सहित इन तीनों शक्तियों का संयुक्त रूप समाया हुआ है। ऐसा माना जाता है कि यहां आने वाले भक्तों को मां अपने 18 हाथों से सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब राजा दक्ष के यज्ञ में माता सती ने अपने प्राण त्याग दिए थे, तब क्रोधित भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर तांडव करने लगे। संसार को बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के अंग काटे। माना जाता है कि माता सती का दाहिना हाथ इसी सप्तश्रृंग पर्वत पर गिरा था।
मंदिर के गर्भगृह में मां सप्तश्रृंगी की लगभग 8 से 10 फीट ऊंची विशाल प्रतिमा है। यह मूर्ति इंसानों द्वारा बनाई नहीं गई है, बल्कि एक विशाल चट्टान पर खुद-ब-खुद प्रकट हुई हैं। मूर्ति पूरी तरह से सिंदूरी रंग में लिपटी हुई है। मां की 18 भुजाएं हैं जिनमें अलग-अलग देवी-देवताओं द्वारा दिए गए दिव्य अस्त्र-शस्त्र सुशोभित हैं।
एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, महिषासुर राक्षस का वध करने के बाद देवी दुर्गा बहुत क्रोधित थीं। अपने इस रौद्र रूप को शांत करने के लिए मां ने सह्याद्रि की इन सात चोटियों पर आकर विश्राम किया था। मंदिर की सीढ़ियों के पास आज भी महिषासुर के कटे हुए सिर की पत्थर की आकृति और त्रिशूल के प्रहार से पहाड़ी पर बना छेद देखने को मिलता है।
रामायण काल से जुड़ी एक कथा यह भी है कि जब युद्ध में लक्ष्मण जी को शक्ति बाण लगा था, तब हनुमान जी संजीवनी बूटी के लिए द्रोणागिरी पर्वत उठाकर ले जा रहे थे। रास्ते में द्रोणागिरी पर्वत का एक छोटा सा टुकड़ा इसी सप्तश्रृंग पर्वत पर गिर गया था।
ऋषि मार्कंडेय ने मां दुर्गा की भक्ति में इसी स्थान पर 'दुर्गा सप्तशती' की रचना की थी। अगर आप ध्यान से देखेंगे, तो मंदिर में मां की प्रतिमा की गर्दन थोड़ी सी एक तरफ झुकी हुई है। मान्यता है कि सामने वाले पर्वत पर बैठकर जब ऋषि मार्कंडेय पाठ कर रहे थे, तो मां उनकी स्तुति को ध्यान से सुनने के लिए उस ओर झुक गई थीं।
इस पावन मंदिर परिसर के आसपास 108 दिव्य जलकुंड बने हुए हैं, जिनका रहस्य आज भी लोगों को हैरान करता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, ब्रह्मा जी के कमंडलु से निकली 'गिरिजा महानदी' ही मां सप्तश्रृंगी का रूप धारण करके यहां प्रकट हुई हैं।
नासिक शहर से लगभग 65 किलोमीटर दूर स्थित इस मंदिर तक पहुंचने के लिए लगभग 472 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। जो श्रद्धालु सीढ़ियां चढ़ने में असमर्थ हैं, उनके लिए रोपवे जैसी सुविधा का इंतज़ाम किया गया है। मंदिर में तीन द्वार शक्ति द्वार, सूर्य द्वार और चंद्रमा द्वार से होकर भक्त गर्भगृह में दर्शन करते हैं।
चैत्र और आश्विन नवरात्रि के दौरान यहां बहुत बड़ा मेला लगता है। नवरात्रि में मां की गोद भराई की विशेष परंपरा है, जिसमें भक्त नारियल, चुनरी, साड़ी, चूड़ी, सिंदूर और मिठाई चढ़ाते हैं। यहां आने वाले सभी श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में महाराष्ट्र राज्य का प्रसिद्ध व्यंजन 'पूरन पोली' दिया जाता है।