Highlights:
नासिक और त्र्यंबकेश्वर में सिंहस्थ कुंभ मेले का आयोजन प्रस्तावित कार्यक्रम के अनुसार 20 जुलाई से 12 सितंबर 2027 तक होगा।
नासिक में वैष्णव संप्रदाय के दिगंबर, निर्मोही और निर्वाणी अखाड़ों में 24 जुलाई को धर्म ध्वजा स्थापित की जाएगी।
धर्म ध्वजा स्थापना के बाद 29 जुलाई 2027 को वैष्णव अखाड़ों की पेशवाई निकलेगी।
Nashik Simhastha Kumbh Mela 2027: 31 अक्टूबर को राष्ट्रपति और मुख्यमंत्री के हाथों नासिक और त्र्यंबकेश्वर में धर्म ध्वजारोहण के बाद सोशल मीडिया पर ऐसी पोस्टों की भरमार आ गई की नासिक कुंभ शुरू लेकिन ऐसा कुछ नहीं है 31 अक्टूबर को धर्म ध्वजारोहण गुरु का सिंह राशि में प्रवेश या यह भी कहा जा सकता है कि सिंहस्थ का श्री गणेश लेकिन इसे कुंभ मेला का शुभारंभ या कुंभ मेला शुरू नहीं कहा जा सकता क्योंकि सबसे पहले मिला के शाब्दिक अर्थ को समझिए मेला' शब्द का शाब्दिक अर्थ "सभा", "मिलना" या "मिलन" होता है।
यह मूल रूप से संस्कृत भाषा के 'मेलक' या 'मिल्' धातु से बना शब्द है, जिसका सीधा सम्बंध लोगों के आपस में एक जगह एकत्रित होने या मेल-जोल करने से है। व्यापक रूप में मेले के कई अर्थ और रूप होते हैं' लोगों का जमावड़ा किसी विशेष त्योहार, उत्सव, धार्मिक पर्व या देव-दर्शन के अवसर पर एक स्थान पर बहुत से लोगों का एकत्र होना यहां पर मिला के पहले कुंभ मेला या महाकुंभ मेला शब्द जुड़ा हुआ है और कुंभ का प्रतीक धार्मिक है।
किसी धार्मिक मेले का स्वरूप तब बनता है जब वहां पर साधु संत तपस्वी बैरागी सन्यासी का जमावड़ा हो और जगह-जगह पर यज्ञ हवन कथा प्रवचन आहुतियां के साथ भंडारे होते रहे धर्म का प्रचार हो और यह सब नासिक यतम के स्वर में अभी शुरू होने में काम से कम 8 महीने की देरी है क्योंकि अभी पुलिस प्रशासन और सरकार को भी बहुत सारी तैयारी करनी है और सबसे पहले प्रशासन को देश के कोने-कोने से आने वाले साधु संत तपस्वी बैरागी संन्यासियों को भूखंड या जमीन उपलब्ध कराना पहली प्राथमिकता है और जब यह जमीन उनको मिल जाएगी फिर वह अपने-अपने क्षमता के हिसाब से उसे जमीन पर भव्य दिव्य पंडाल बनाकर धार्मिक कार्य शुरू करेंगे तभी कुंभ मेला कहा जा सकता है।
कुंभ की शुरुआत अखाड़े की धर्म ध्वज स्थापना से मानी जाती है क्योंकि धर्म ध्वज की स्थापना के बाद ही अखाड़े के अंदर धार्मिक या आध्यात्मिक गतिविधियां शुरू होती हैं और इसके बाद सभी अखाड़े धूमधाम उल्लास हर्ष और अपनी क्षमता के हिसाब से हाथी घोड़े रातों पर सोने चांदी के सिंहासन पर बैठकर पेशवाई निकलते हैं जिसे आम भाषा में शोभा यात्रा भी कहा जा सकता है और यह पेशवाई जब अखाड़े में प्रवेश कर जाती है तो उसी के बाद से अखाड़े का पुरानी परंपरा और मान्यताओं के हिसाब से संचालन शुरू होता है।
नासिक त्र्यंबकेश्वर महाकुंभ दो भागों में विभाजित है जहां पर नासिक में वैष्णो संप्रदाय के तीनों अनी अखाड़े का छावनिया लगती है इस संबंध में तीनों अनी अखाड़े के राष्ट्रीय प्रवक्ता भक्ति दास महाराज का कहना है कि 24 जुलाई को सबसे पहले दिगंबर उसके बाद निर्मोही और फिर निर्वाणी अखाड़े में धर्म ध्वज की स्थापना होगी।
इन तीनों अखाड़े में धर्म ध्वज की स्थापना के बाद ही चतुर संप्रदाय तेरा भाई त्यागी 14 भाई त्यागी खाकी अखाड़ा और डेकोर जैसे बड़े अखाड़े के साथ सभी जगद्गुरु रामानंदाचार्य वल्लभाचार्य माधवाचार्य के छावनियों में धर्म ध्वज की स्थापना होगी और उसके बाद 29 जुलाई 2027 को पेशवाई निकल जाएगी और अखाड़े में धूमधाम से प्रवेश होगा और फिर आध्यात्मिक सामाजिक गतिविधियों के साथ अखाड़े के द्वारा अन्य क्षेत्र भंडारों का भी सेवा कार्य शुरू हो जाएगा।
यहां पर यह बता दिया जाए की त्र्यंबकेश्वर स्थित 10 संन्यासी अखाड़ों में अभी धर्म ध्वज की स्थापना और पेशवाई की तारीख का फैसला नहीं हुआ है यहां पर जूना आवाहन अग्नि और किन्नर एक दिन धर्म ध्वजा करते हैं फिर निरंजन और आनंद एक साथ तो वही महा निर्वाणी और अटल एक साथ और उदासीन परंपरा के बड़ा उदासीन नया उदासीन और निर्मल एक साथ धर्म ध्वज की स्थापना करते हैं लेकिन सब की पेशवाई अलग-अलग होती है।