इंद्रदेव आनंद सरस्वती (फोटो नवभारत)
नासिक

सिंहस्थ नासिक कुंभ 2015 में भी चर्चा में आए थे इंद्रदेव, जानिए विवादों से जुड़ा इनका सफर

Indradev Ananda Saraswati: इंद्रदेव महाराज से इंद्र देवानंद सरस्वती और फिर महामंडलेश्वर बनने तक का सफर चर्चा में रहा है। 2015 के नासिक कुंभ में भी उनके नाम और उपाधि को लेकर विवाद हुआ था।

रामबाबू चौबे, आलोक उमाकृष्ण

Highlights

  • लेख के अनुसार, इंद्रदेव का जन्म 2 फरवरी 1976 को मथुरा के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

  • एटा जिले के आर्य गुरुकुल से वैदिक शिक्षा प्राप्त करने का दावा।

  • 2010 में जलगांव के पारोला क्षेत्र में कथा करने पहुंचे थे।

  • 2015 के नासिक-त्र्यंबकेश्वर कुंभ में नाम और संप्रदाय को लेकर विवाद हुआ था।

Journey From Kathavachak To Mahamandaleshwar: 2 फरवरी 1976 को उत्तर प्रदेश मथुरा के एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे इंद्रदेव की शिक्षा दीक्षा उत्तर प्रदेश के एटा जिले आर्य गुरुकुल से वैदिक शिक्षा प्राप्त की और कहां जाता है की मात्रा 9 वर्ष की उम्र से ही इन्होंने श्रीमद् भागवत कथा का वचन आरंभ कर दिया था 2010 में एक भागवत कथा करने यह परोला जलगांव आए थे और फिर वह परोला के बगल साव खेड़ा अपना आश्रम बना लिए।

आश्रम की मुक्त जमीन इन्हें दान में मिली थी और जिस परिवार ने दान दिया था उसे परिवार के एक बुजुर्ग व्यक्ति को किसी बड़ी गंभीर बीमारी से मुक्ति दिलाई थी और यही कारण है कि आज भी जलगांव जिले में इन्हें कथा वाचक से ज्यादा आयुर्वेदिक विशेषज्ञ के रूप में लोग जानते हैं और मुक्ति आश्रम में उनकी मौजूदगी के समय प्रतिदिन हजारों लोग अपनी नाड़ी दिखाकर इसे दवा और सलाह लेने आते हैं।

नौटंकी बाज कथाकार के रूप में मिली लोकप्रियता

वैसे इस क्षेत्र की जनता के बीच चर्चा है कि इनका दावा था कि यह जबलपुर आयुर्वैदिक मेडिकल कॉलेज में डॉक्टर से और वहां से इस्तीफा देकर वह धर्म की दुनिया में आए लेकिन ऐसा कोई प्रमाण इनके पास उपलब्ध नहीं है और आज तक वह जनता के सामने प्रस्तुत भी नहीं कर सके लेकिन यह अपने नाम के आगे डॉक्टर कभी आयुर्वेद विशेषज्ञ तो कभी नेचुरोपैथी विशेषज्ञ लिखते चले आ रहे हैं।

श्रीमद् भागवत कथा शिव पुराण देवी पुराण और राम कथा कहने वाले इंद्रदेव को एक नौटंकी बाज कथाकार के रूप में लोकप्रियता मिलती चली गई जी व्यास पीठ की गरिमा और उसका महत्व धार्मिक ग्रंथो में उल्लेख है इस व्यासपीर पर खड़े होकर कभी बांसुरी बजाना तो कभी नाचना इनका मुख्य कार्य था।

औरतों की तरह ही साड़ी पहनना और श्रृंगार करके कथा व्यास पीठ पर बैठना इनका शौक था। लेकिन अब एक नए तरह के विवाद में फस जाने के बाद सोशल मीडिया में इन्हें पाखंडी नौटंकी और अन्य तरह के भाषण का उपयोग किया जा रहा है।

2015 के नासिक कुंभ में इनको लेकर मचा था बवाल

2015 के नासिक त्रंबकेश्वर कुंभ के दौरान उनकी पहली बार किसी सिंहस्थ कुंभ मेले में एंट्री होती है और इन्होंने वैष्णो संप्रदाय के प्रमुख संत जानकी शरण दास जी महाराज के कैंप में अपना कथा पंडाल बनाया था लेकिन एकाएक इनका संपर्क आनंद अखाड़े के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उसे समय नासिक त्रंबकेश्वर कुंभ के स्थानीय अखाड़ा परिषद अध्यक्ष श्री महंत सागरा नंद सरस्वती से होता है और वह एक ही रात में उन्हें गुरु मानते हुए इंद्रदेव महाराज से इंद्र देवानंद सरस्वती बन गए जो उसे समय कुंभ में चर्चा का विषय ही नहीं विवाद का कारण भी बन गया था।

वैष्णो संतों ने किया बहिष्कार नहीं हो पाया था पंडाल में कोई आयोजन

नासिक जिले के तपोवन में स्थित अयोध्या के जानकी शरण दास महाराज के पंडाल में उनके द्वारा बनवाया गया दिव्य भव्य कथा पंडाल एक समारोह का आयोजन किया गया जिसमें तत्कालीन अखाड़ा परिषद अध्यक्ष नरेंद्र गिरी सहित संन्यासी अखाड़ों के कई श्री महानतम महामंडलेश्वरों को बुलाया गया था लेकिन वैष्णो अखाड़े की तरफ से ज्ञान दास ने मोर्चा खोलते हुए।

इस समारोह का बहिष्कार कर दिया और इंद्रदेव महाराज को इंद्र देवानंद सरस्वती लिखना इतना भारी पड़ा की उन्हें कथा पंडाल में कार्यक्रम का आयोजन रद्द करना पड़ा उसके बाद यह कार्यक्रम आनंद अखाड़े में आयोजित किया गया जहां इन्हें धर्माचार्य की उपाधि दी गई। लेकिन इसके बाद इन्होंने पाला बदलते हुए निरंजनी अखाड़े में शरण ली और फिर इन्हें महामंडलेश्वर बना दिया गया जो अब इनके वायरल हो रहे ऑडियो के कारण सनातन धर्म पर सबसे बड़ा कलंक बनता जा रहा है।

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