Nirmal Ujjwal Cooperative Society Scam Nagpur: विदर्भ की प्रमुख 'निर्मल उज्ज्वल क्रेडिट को-ऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड' (Nirmal Ujjwal Credit Cooperative Society) के नागपुर स्थित नंदनवन मुख्यालय पर जमाकर्ताओं ने अपनी फिक्स्ड डिपॉजिट और जमा राशि वापस न मिलने पर जोरदार प्रदर्शन और हंगामा किया। स्थिति बिगड़ती देख पुलिस प्रशासन को कार्यालय परिसर और संस्थापक के आवास के बाहर सुरक्षा बल तैनात करना पड़ा।
5 अक्टूबर को नंदनवन स्थित सोसाइटी के मुख्य कार्यालय और उसके संस्थापक सचिव प्रमोद मानमोड़े के आवास के बाहर सैकड़ों परेशान जमाकर्ताओं की भीड़ इकट्ठा हो गई। इससे पूर्व जगनाडे चौक स्थित अनुसूया सभागृह में आयोजित संस्था की वार्षिक आमसभा (AGM) में भी जमाकर्ताओं की प्रबंधन के साथ तीखी नोकझोंक हुई थी।
परिसर में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए नंदनवन और कोतवाली पुलिस थाने की टीम तैनात की गई। नंदनवन थाने के वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक कैलाश देशमाने ने पुष्टि की कि एहतियात के तौर पर यह पुलिस बंदोबस्त लगाया गया था। हालांकि, पुलिस की भारी मौजूदगी देखकर स्थानीय स्तर पर यह अफवाह फैल गई कि आयकर विभाग ने सोसाइटी पर छापा मारा है, जिससे घबराकर और भी अधिक खाताधारक मौके पर पहुंच गए। बाद में पुलिस ने स्पष्ट किया कि वहां कोई आयकर छापा नहीं पड़ा है।
विदर्भ क्षेत्र में इस सोसाइटी की 50 से अधिक शाखाएं हैं, जहां आम नागरिकों और छोटे व्यापारियों के करोड़ों रुपये जमा हैं। जमाकर्ताओं के आक्रोश के मुख्य कारण हैं-
भुगतान में विफलता: डिपॉजिट मैच्योरिटी की अवधि पूरी होने के बाद भी लोगों को उनकी जमा राशि और ब्याज वापस नहीं मिल रहा है।
चेक बाउंस होना: कई खाताधारकों को दिए गए चेक बाउंस हो चुके हैं, जिससे खाताधारकों में अविश्वास बढ़ गया है।
समयसीमा खत्म होना: आमसभा में संस्थापक सचिव प्रमोद मानमोड़े ने वित्तीय व्यवस्था सुचारू करने के लिए 45 से 60 दिनों का समय मांगा था। लेकिन यह अवधि बीत जाने के बाद भी भुगतान शुरू नहीं हो सका।
लिक्विडेशन का डर: दिल्ली स्थित 'सेंट्रल रजिस्ट्रार ऑफ को-ऑपरेटिव सोसायटीज' द्वारा लगभग 51.70 करोड़ रुपये की कथित अनियमितताओं को लेकर संस्था को लिक्विडेशन की नोटिस जारी करने की जानकारी सामने आने के बाद खाताधारकों का सब्र टूट गया।
जमाकर्ताओं का आरोप है कि संस्था में जमा राशि के मुकाबले कर्ज वितरण कम है और उनके पैसों को बिना अनुमति अन्य व्यवसायों में लगाया गया है। दूसरी ओर, प्रबंधन का दावा है कि संस्था के पास पर्याप्त संपत्तियां हैं और वर्तमान समस्या केवल Liquidity की कमी से जुड़ी है।
इस संस्था का संकट अचानक शुरू नहीं हुआ है, बल्कि इसके तार पुराने वित्तीय घोटालों और अदालती कारवाइयों से जुड़े हैं।
डिपॉजिट स्वीकारने पर प्रतिबंध: संस्था में वित्तीय अनियमितताओं और फंड के अपहार की शिकायतों के आधार पर केंद्रीय सहकारी निबंधक ने 24 अप्रैल 2026 को ही सोसाइटी के नए डिपॉजिट स्वीकार करने, पुरानी एफडी के नवीनीकरण और नए निवेश लेने पर रोक लगा दी थी।
हाई कोर्ट द्वारा रोक बरकरार: सोसाइटी ने केंद्र सरकार के इस प्रतिबंध को बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर खंडपीठ में चुनौती दी थी। हालांकि, न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी-फाळके और न्यायमूर्ति निवेदिता मेहता की पीठ ने याचिका खारिज करते हुए प्रतिबंध को बरकरार रखा।
फर्जी प्रॉफिट और फंड डायवर्जन: अदालत ने पाया कि संस्था ने ओवरड्यू कर्जों पर मिलने वाले ब्याज को प्रॉफिट के रूप में दिखाकर सदस्यों को गुमराह किया था। इसके अलावा, नियमों को ताक पर रखकर 'पीएनजी कॉर्पोरेशन' जैसी संस्थाओं को कर्ज दिया गया और लगभग 317 करोड़ रुपये की राशि बिना अनुमति के घाटे वाले व्यवसायों में डायवर्ट कर दी गई।
1,497 करोड़ रुपये का संग्रह: जांच में सामने आया कि सोसाइटी ने नियमों का उल्लंघन करके करीब 1,497 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि जमाकर्ताओं से जुटाई थी।
SIT और EOW की जांच: सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इस पूरे मामले की जांच SIT और आर्थिक अपराध शाखा (EOW) द्वारा की जा रही है, जिन्होंने मामले में चार्जशीट भी दाखिल की है।
वर्तमान में विदर्भ के हजारों जमाकर्ता अपने जीवन भर की कमाई वापस पाने के लिए एसआईटी की अंतिम रिपोर्ट और सरकारी हस्तक्षेप का इंतजार कर रहे हैं।