Nagpur Sports Cost: हर सुबह-शाम शहर के किसी न किसी मैदान पर पसीना बहाते बच्चे दिख जाते हैं। किसी के हाथ में बल्ला है, कोई रैकेट थामे है। कोई ट्रैक पर दौड़ रहा है तो कोई क्ले कोर्ट पर गेंद के पीछे भाग रहा है। इन सभी की आंखों में एक ही सपना है ‘अच्छा खिलाड़ी बनना।’ लेकिन इस सपने के रास्ते में सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी कोई टीम या खिलाड़ी नहीं बल्कि खर्च है। नागपुर जैसे शहर में खेल अब सिर्फ प्रतिभा और मेहनत का मामला नहीं रह गया है।
आज सवाल यह नहीं कि बच्चा कितना अच्छा खेलता है बल्कि यह है कि उसका परिवार कितना खर्च उठा सकता है। एक स्टेट या नेशनल खिलाड़ी को तैयार करना अब निम्न मध्यमवर्गीय परिवार के बस की बात नहीं रही। खासकर महानगरों में खेल पूरी तरह प्रोफेशनल हो गया है। सबसे सस्ता माने जाने वाला एथलेटिक्स भी इन परिवारों की पहुंच से दूर होता जा रहा है।
शुरुआत में सब ठीक लगता है। मासिक कोचिंग फीस, थोड़ा बहुत किट खर्च- परिवार जैसे-तैसे मैनेज कर लेता है लेकिन जैसे ही बच्चा टूर्नामेंट खेलने लगता है, असली परीक्षा शुरू होती है। एंट्री फीस, जिले या राज्य से बाहर आने-जाने का खर्च, बस/ट्रेन टिकट, भोजन, रहने की व्यवस्था, नई किट और जूते। यहीं से खेल शौक से बोझ बनने लगता है।
लोअर मिडिल क्लास परिवार जिनकी मासिक आय 25-40 हजार रुपए के आसपास होती है, उनके लिए यह खर्च लगातार असंभव बनता जाता है। ऐसे हर घर में एक मोड़ आता है- ‘अब खेल जारी रखें या पढ़ाई पर फोकस करें?’ अक्सर यह फैसला बच्चे के खिलाफ जाता है। 14–16 साल की उम्र में, जब खिलाड़ी असली फॉर्म में होता है, तभी उसे खेल छोड़ने पर मजबूर होना पड़ता है। वजह साफ है- मैच खेलने का पैसा नहीं होना।
खिलाड़ियों के लिए सरकारी सुविधाएं न के बराबर हैं। खेल की बारीकियां सीखने के लिए निजी अकादमियां हैं लेकिन वह बहुत महंगी है। बच्चों का स्कॉलरशिप बहुत कम है, टैलेंट स्काउटिंग कमजोर है। नतीजा यह कि स्टेट और नेशनल लेवल तक वही पहुंचते हैं जिनके पास आर्थिक सहारा होता है। बाकी खिलाड़ी सिर्फ ‘काबिल थे’ बनकर रह जाते हैं।
स्कूल और वार्ड लेवल पर मुफ्त प्रतियोगिताएं हों, ट्रैवल और एंट्री फीस में सरकारी सहयोग मिले, खेल को ‘लक्ज़री’ नहीं बल्कि अवसर बनाया जाए। अगर खेल सिर्फ वही खेल पाएंगे जो खर्च उठा सकते हैं तो देश अनगिनत ऐसे खिलाड़ियों को खो देगा जिनके पास हुनर था, हौसला था, बस जेब मजबूत नहीं थी।
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- नवभारत लाइव पर नागपुर से जयदीप रघुवंशी की रिपोर्ट