नागपुर मेडिकल कॉलेज (सौजन्य-सोशल मीडिया) 
नागपुर

1100 करोड़ के इंफ्रास्ट्रक्चर के बीच कैंसर इलाज बदहाल, क्या बंद हो जाएंगी मेडिकल की 5 पीजी सीटें?

Nagpur GMC Medical: नागपुर मेडिकल में कैंसर मरीजों की जान जोखिम में! कोबाल्ट मशीन का सोर्स खत्म, 1.32 करोड़ की निधि न मिलने से इलाज ठप होने की कगार पर। पढ़ें ग्राउंड रिपोर्ट।

प्रिया जैस

Cancer Treatment Nagpur: शासकीय वैद्यकीय महाविद्यालय व अस्पताल में इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए सरकार द्वारा 1,100 करोड़ की निधि उपलब्ध कराई गई है, लेकिन अब भी कई विभागों के आधुनिकीकरण पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। एक ओर जहां रोबोटिक सर्जरी के नाम पर प्रशासन खुद को अव्वल साबित करने में लगा है वहीं दूसरी ओर कैंसर विभाग को नजरअंदाज किया जा रहा है।

स्थिति यह है कि कोबाल्ट मशीन अब अंतिम सांसें गिन रही है। मशीन कभी भी बंद हो सकती है। यदि मशीन बंद हुई तो फिर मरीजों को भटकना पड़ सकता है। मेडिकल का कैंसर विभाग निर्धन व जरूरतमंदों के लिए सहारा बना हुआ है। विविध सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने से मध्य भारत से मरीज उपचार के लिए आते हैं। आधुनिक तकनीक के दौर में कई बदलाव हुये हैं।

विभागों में मशीनों की कमी

इस तुलना में विभाग में मशीनों की कमी है। लीनियर एक्सीलेटर, सीटी सिम्युलेटर, ब्रेकी थेरेपी जैसी अत्याधुनिक मशीनों की कमी है। एकमात्र कोबाल्ट यूनिट के भरोसे विभाग चलाया जा रहा है। यदि यह मशीन बंद पड़ी तो फिर विभाग केवल ओपीडी तक ही सीमित रह जाएगा। इसे प्रशासनिक दुर्दशा ही कहा जाएगा।

  • 2020 से ही सोर्स की कमी
  • 1.32 करोड़ सोर्स की कीमत
  • 15-20 मरीजों की ही थेरेपी

5 वर्षों से ‘ऑक्सीजन’ पर व्यवस्था

2006 में केंद्र सरकार की निधि से यह कोबाल्ट मशीन खरीदी गई थी। इस मशीन के जिस हिस्से से रेडिएशन दिया जाता है, उसे सोर्स कहा जाता है। यह सोर्स 5 साल में बदलना पड़ता है। आखिरी बार 2015 में सोर्स बदला गया था। इसके बाद से नहीं बदला गया। इसकी कीमत 1.32 करोड़ रुपये तक होती है, जो विदेश से मंगाया जाता है। इसकी क्षमता 2020 में खत्म हो चुकी है।

2023 से प्रशासन को सतत रूप से निधि के लिए पत्र भेजे जा रहे हैं, लेकिन अब तक निधि नहीं मिली। उम्मीद थी कि जिला नियोजन समिति से निधि मिलेगी, लेकिन निराशा ही हाथ लगी। समिति ने नई मशीनें खरीदने और दवाइयों के लिए करीब 19 करोड़ रुपये दिये हैं लेकिन इसमें कोबाल्ट यूनिट के लिए निधि नहीं मिली है।

पीजी सीटों पर भी संकट के बादल

कैंसर मरीजों के लिए कोबाल्ट मशीन महत्वपूर्ण होती है। इसके बिना इलाज संभव नहीं है। यदि यह मशीन बंद पड़ गई तो फिर विभाग के पास कोई भी मशीन नहीं रह जाएगी। इस हालत में विभाग केवल ओपीडी तक ही सीमित रह जाएगा। इतना ही नहीं, विभाग में स्नातकोत्तर की 5 सीटों पर भी संकट के बादल छा सकते हैं क्योंकि नया कैंसर अस्पताल बनने और शुरू होने में अभी काफी वक्त है।

यदि एनएमसी ने सख्त रवैया अपनाया तो एक झटके में स्नातकोत्तर की सीटें खत्म हो जाएंगी। मामला बेहद गंभीर होने के बावजूद वैद्यकीय शिक्षा विभाग द्वारा गंभीरता नहीं बरती जा रही है। पहले इस मशीन पर हर दिन 80 मरीजों को थेरेपी दी जाती थी, लेकिन अब यह संख्या 15-20 ही रह गई है। इस हालत में मरीजों की प्रतीक्षा सूची भी दिनोंदिन बढ़ती जा रही है।

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