Nagpur Ebola Centre Project: 'इबोला, मर्स और जिका' जैसे खतरनाक वायरस से निपटने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने वर्ष 2017 में नागपुर के शासकीय वैद्यकीय महाविद्यालय एवं अस्पताल में विशेष उपचार केंद्र शुरू करने की मंजूरी दी थी, लेकिन नौ साल बाद भी यह परियोजना जमीन पर नहीं उतर सकी। अब जब दुनिया में फिर से खतरनाक संक्रामक बीमारियों को लेकर चिंता बढ़ रही है, तब इस अधूरी योजना ने स्वास्थ्य व्यवस्था की तैयारियों पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
वर्ष 2014-15 में अफ्रीकी देशों में फैली इबोला महामारी ने हजारों लोगों की जान ले ली थी। उस समय बीमारी की गंभीरता को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वैश्विक अलर्ट जारी किया था। संक्रमण के खतरे को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और नागपुर समेत कई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर यात्रियों की स्क्रीनिंग शुरू करवाई थी।
इसी दौरान मध्य भारत में दुर्लभ संक्रामक रोगों के इलाज के लिए नागपुर मेडिकल में विशेष इबोला सेंटर बनाने का प्रस्ताव तैयार हुआ। तत्कालीन स्वास्थ्य अधिकारियों ने निरीक्षण कर परियोजना को मंजूरी भी दी और केंद्र सरकार की ओर से फंडिंग की तैयारी शुरू हुई थी।
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देश में इबोला वायरस का कोई बड़ा मामला सामने नहीं आने के कारण यह योजना धीरे-धीरे फाइलों में दबकर रह गई। वर्तमान में स्थिति यह है कि यदि भविष्य में इबोला, मर्स या जिका जैसी बीमारी का प्रकोप बढ़ता है, तो सरकारी अस्पतालों में विशेष उपचार सुविधा उपलब्ध नहीं है। वहीं निजी अस्पताल भी ऐसे मरीजों को भर्ती करने से बचते हैं। फिलहाल नागपुर मेडिकल में संदिग्ध मरीजों के लिए अस्थायी वार्ड तैयार रखा गया है, परंतु विशेषज्ञ इसे नाकाफी मान रहे हैं।
पूर्व राज्य महासचिव प्रमोद रक्षमवार ने कहा है कि 'भविष्य की स्वास्थ्य चुनौतियों को देखते हुए विशेष उपचार केंद्र की जरूरत आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है और सरकार को इस लंबित परियोजना को जल्द शुरू करना चाहिए।'