

Why are UP cadre IAS officers leaving service: उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक बड़ा सवाल तैर रहा है। आखिर देश की सबसे प्रतिष्ठित मानी जाने वाली प्रशासनिक सेवा (IAS) से अफसरों का मोह क्यों भंग हो रहा है? देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश कैडर के एक-दो नहीं, बल्कि 13 से अधिक अधिकारियों ने अपनी सेवा अवधि पूरी होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया है या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) चुन ली है। इनमें युवा अफसरों से लेकर कई वरिष्ठ प्रशासनिक दिग्गज तक शामिल हैं।
हाल ही में मिर्जापुर और देवरिया की पूर्व डीएम रहीं 2013 बैच की आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल द्वारा दिया गया इस्तीफा इस कड़ी की सबसे ताजा और चर्चित मिसाल बन गया है।आईआईटी दिल्ली और आईआईएम बैंगलोर से पढ़ीं दिव्या मित्तल ने लंदन की हाई-पेइंग जॉब छोड़कर देश सेवा के लिए आईएएस चुना था, लेकिन 13 साल के कार्यकाल के बाद उन्होंने इस सेवा को अपनी इच्छा से विराम दे दिया।
IAS जूथिका पाटणकर (1988 बैच): वरिष्ठता के उच्च स्तर पर पहुंचकर सेवा से वीआरएस का रास्ता चुना।
IAS रेणुका कुमार (1987 बैच): राज्य और केंद्र सरकार में अहम पदों पर रहने के बाद समय से पूर्व सेवानिवृत्ति ली।
IAS आमोद कुमार (1995 बैच) व IAS मोहम्मद मुस्तफा (1995 बैच): वरिष्ठ स्तर के अफसरों ने अपनी सेवाएं बीच में ही समाप्त करने का फैसला किया।
IAS राजीव अग्रवाल (1993 बैच): अपने प्रशासनिक करियर को अलविदा कहकर निजी क्षेत्र की राह पकड़ी।
IAS विकास गोठलवाल (2003 बैच) व IAS रिग्जिन सैम्फिल (2003 बैच): कार्यशैली और व्यक्तिगत कारणों का हवाला देकर वीआरएस लिया।
IAS अनामिका सिंह (2004 बैच): प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बीच से वीआरएस का विकल्प चुना।
IAS विद्या भूषण (2008 बैच): निजी और स्वास्थ्यगत कारणों से इस्तीफा/वीआरएस लेकर चर्चा में आए।
IAS अभिषेक सिंह (2011 बैच): अपने अनूठे अंदाज और चर्चित कार्यकाल के बाद नौकरी से इस्तीफा दे दिया।
IAS दिव्या मित्तल (2013 बैच): जमीनी स्तर पर जनता से जुड़ाव रखने के बावजूद अचानक इस्तीफा देकर सेवा से अलग हुईं।
IAS रविन्द्र पाल सिंह (2015/2014 बैच): विशेष सचिव भाषा के पद पर रहते हुए वीआरएस के लिए आवेदन किया और सेवा छोड़ दी।
IAS राकेश वर्मा: सेवा और प्रशासनिक प्राथमिकताओं के बीच संतुलन न बन पाने के कारण अपने फैसले से चर्चा में रहे।
एक समय था जब आईएएस की नौकरी को सुरक्षा, पावर और प्रतिष्ठा का पर्याय माना जाता था, लेकिन मौजूदा दौर में अफसरों का यह रुझान कई गंभीर सवाल खड़े करता है:
राजनीतिक दबाव और बेवजह का हस्तक्षेप: प्रशासनिक हलकों में चर्चा रहती है कि जमीनी स्तर पर फैसले लेते समय अक्सर राजनीतिक इच्छाशक्ति और सिस्टम के बेवजह दबाव का सामना करना पड़ता है, जिससे स्वतंत्र और निष्पक्ष काम करने वाले अफसरों का दम घुटने लगता है।
काम का तनाव और मानसिक थकान: ब्यूरोक्रेसी में 24 घंटे की ड्यूटी, आए दिन तबादलों की तलवार और लगातार बनते वर्क प्रेशर के कारण अधिकारी मानसिक तनाव का शिकार हो रहे हैं।
कॉरपोरेट व निजी विकल्पों का आकर्षण: आईआईटी, आईआईएम और विदेश में पढ़े-लिखे नए जमाने के आईएएस अधिकारियों के पास कॉरपोरेट सेक्टर, थिंक टैंक और अकादमिक क्षेत्र में बेहतरीन अवसर मौजूद रहते हैं।
व्यक्तिगत व पारिवारिक प्राथमिकताएं: कई मौकों पर जीवनसाथी (पति/पत्नी) के अलग शहर या राज्य में पदस्थ होने की वजह से भी अधिकारी वीआरएस का रुख करते हैं। यूपी कैडर के इन 13 चर्चित चेहरों का एक-एक करके सिस्टम से बाहर होना इस बात का संकेत है कि प्रशासनिक व्यवस्था को अब आंतरिक सुधारों और अफसरों को स्वतंत्र व सुरक्षित कार्य माहौल देने की सख्त आवश्यकता है।