

Amrita Pritam Birth Anniversary: सोशल मीडिया के दौर में गुजरे जमाने के कुछ शायर, लेखक और कहानीकार ऐसे हैं, जिन्हें आज की जेन-जी पीढ़ी भी उतना ही प्यार करती है, जितना शायद आज से सालों पहले उनके मां-पिता ने किया होगा। इन्हीं में एक नाम मशहूर कवयित्री, उपन्यासकार और निबंध लेखिकी अमृता प्रीतम का भी है। अमृता प्रीतम की मकबूलियत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2005 में प्रकाशित हुई उनकी कविता 'मैं तैनू फिर मिलांगी' जेन-जी के बीच इतनी लोकप्रिय है कि कई अलग-अलग लोगों ने इसे अपने तरीके से पेश किया है।
हालांकि, अमृता प्रीतम की पहचान सिर्फ कुछ लाख सोशल मीडिया पोस्ट और गीतों तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे कहीं आगे है। उन्होंने सिर्फ साहित्य नहीं लिखा, बल्कि अपने समय की औरत की भावनाओं को आवाज दी। उन्होंने प्रेम, दर्द, अकेलेपन, समाज की बंदिशों और महिलाओं के संघर्ष को बेहद सहज और बेबाक अंदाज में लिखा। उनकी खासियत यह थी कि उन्होंने जैसा लिखा, वैसा ही जीवन भी जिया। उन्होंने दूसरों के बनाए रास्तों पर चलने के बजाय अपनी राह खुद चुनी।
अमृता प्रीतम का जन्म 31 अगस्त 1919 को तत्कालीन पंजाब के गुजरांवाला में हुआ था। उनका बचपन मुश्किलों से भरा रहा। महज 11 साल की उम्र में उन्होंने अपनी मां को खो दिया। मां के जाने के बाद उनके जीवन में एक गहरी तन्हाई आ गई। इसी अकेलेपन में किताबें और लिखने का शौक उनका सहारा बने। उन्होंने छोटी उम्र में ही कविताएं लिखना शुरू कर दिया था।
अमृता की प्रतिभा बचपन से ही दिखाई देने लगी थी। जब वह सिर्फ 16 साल की थीं, तब उनका पहला कविता संग्रह ‘अमृत लहरें’ प्रकाशित हुआ। इतनी कम उम्र में किताब का प्रकाशित होना उनकी साहित्यिक प्रतिभा का प्रमाण था। इसके बाद उन्होंने लगातार कविताएं, कहानियां, उपन्यास और आत्मकथाएं लिखीं। धीरे-धीरे उनकी लेखनी ने पंजाबी और हिंदी साहित्य में अपनी अलग पहचान बना ली।
1947 का भारत-पाकिस्तान विभाजन अमृता प्रीतम के जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ। लाहौर उनका अपना शहर था, लेकिन बंटवारे की हिंसा ने उन्हें भी वहां से निकलने पर मजबूर कर दिया। इस दौर की पीड़ा ने उनकी लेखनी को और गहरा बना दिया। इसी समय उन्होंने प्रसिद्ध कविता ‘अज्ज आखां वारिस शाह नूं’ लिखी, जो बंटवारे के दर्द की पहचान बन गई। इसके अलावा उन्होंने बंटवारे की पृष्ठभूमि पर आधारित चर्चित उपन्यास ‘पिंजर’ भी लिखा। आगे चलकर 2003 में इसी नाम से बॉलीवुड में एक फिल्म भी बनी। जिसमें मनोज बाजपेयी और उर्मिला मातोंडकर जैसे प्रतिभाशाली कलाकारों ने काम किया था।
अज्ज आखां वारिस शाह नूं में अमृता ने पंजाब के मशहूर कवि वारिस शाह को पुकारते हुए बंटवारे में हुई तबाही का जिक्र किया। खास तौर पर उन्होंने उन महिलाओं के दर्द को सामने रखा, जिन्होंने हिंसा के दौरान अपने परिवार, घर और सम्मान तक खो दिए थे। उनकी कविता भारत और पाकिस्तान, दोनों देशों में लोगों के दिल तक पहुंची। आज भी इसे बंटवारे की सबसे प्रभावशाली कविताओं में गिना जाता है।
अमृता की पहचान केवल सामाजिक मुद्दों पर लिखने वाली लेखिका के रूप में नहीं थी। उन्होंने प्रेम को भी बहुत गहराई से महसूस किया। उनकी जिंदगी में मशहूर शायर साहिर लुधियानवी का खास स्थान रहा। दोनों का रिश्ता बेहद गहरा था, हालांकि उनकी मुलाकातें ज्यादा नहीं हुईं। इसके बावजूद दोनों के बीच भावनात्मक जुड़ाव बना रहा, जिसकी झलक अमृता की रचनाओं में भी दिखाई देती है।
अमृता ने अपनी आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ में साहिर लुधियानवी से जुड़े कई अनुभव लिखे हैं। कहा जाता है कि साहिर के कमरे से जाने के बाद वह उनकी बुझी हुई सिगरेट के टुकड़ों को संभालकर रखती थीं। उन सिगरेट के टुकड़ों में उन्हें साहिर की मौजूदगी महसूस होती थी। यह किस्सा उनके उस प्रेम को दिखाता है, जो बिना किसी औपचारिक रिश्ते के भी बेहद गहरा था।
साहिर के बाद अमृता की जिंदगी में चित्रकार इमरोज आए। दोनों का रिश्ता भी अपने समय से अलग था। उन्होंने बिना शादी किए लंबे समय तक साथ रहकर एक-दूसरे का साथ निभाया। इमरोज सिर्फ उनके जीवनसाथी नहीं थे, बल्कि उनकी भावनाओं और खामोशी को समझने वाले करीबी साथी भी थे। दोनों के रिश्ते में दिखावा कम और समझ, सम्मान और अपनापन ज्यादा था।
अमृता अक्सर रात में लिखती थीं और इमरोज उनके साथ रहते थे। उनके रिश्ते से जुड़ा एक मशहूर किस्सा है कि इमरोज रात करीब एक बजे उनके लिए चाय बनाकर रख देते थे। उनके बीच प्रेम को साबित करने के लिए बड़े वादों की जरूरत नहीं थी। छोटे-छोटे कामों और एक-दूसरे की समझ में उनका रिश्ता दिखाई देता था। यही बात इसे खास बनाती है। अमृता ने अपनी कविता 'मैं तैनू फिर मिलांगी' को इमरोज को ही समर्पित किया था। जो उनकी मौत के पास प्रकाशित हुई।
अमृता के साहित्य में महिला केवल किसी की पत्नी, बेटी या प्रेमिका नहीं है। उनकी रचनाओं में महिला अपनी इच्छा, सोच, सपनों और फैसलों के साथ दिखाई देती है। उन्होंने उन सामाजिक नियमों पर सवाल उठाए, जिन्हें लोग बिना सवाल किए स्वीकार कर लेते थे। यही वजह है कि उनकी लेखनी अपने समय से आगे की मानी जाती है और आज भी महिलाओं के लिए प्रेरणा बनी हुई है।
अमृता प्रीतम को उनके साहित्यिक योगदान के लिए कई बड़े सम्मान मिले। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार, पद्मश्री और पद्मविभूषण जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। हालांकि उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उनके शब्द आम लोगों के दिल तक पहुंचे। पाठकों को उनकी रचनाओं में अपना प्रेम, दर्द, अकेलापन और संघर्ष दिखाई देता था।
31 अक्टूबर 2005 को अमृता प्रीतम का निधन हो गया। लेकिन उनके जाने के बाद भी उनकी रचनाएं लोगों के बीच जीवित हैं। उन्होंने प्रेम को बिना डर के लिखा, समाज के सवालों पर आवाज उठाई और महिलाओं की भावनाओं को सम्मान दिया। उनकी जिंदगी और साहित्य यह बताते हैं कि अपनी सच्चाई के साथ जीना आसान नहीं होता, लेकिन अपनी शर्तों पर जीने की हिम्मत इंसान को हमेशा यादगार बना देती है।