मदर्स डे नागपुर,(सोर्स: नवभारत फाईल फोटो) 
नागपुर

मां का साया नहीं, फिर भी मिली ममता: नागपुर में अनाथ बच्चों के लिए 'मां' बनकर जी रहे हैं ये पुरुष

Nagpur Orphans Children Care: मदर्स डे पर नागपुर के रामभाऊ इंगोले की कहानी प्रेरित करती है। पिछले 30 वर्षों से वे अनाथ बच्चों के लिए ‘मां’ बनकर उनका पालन-पोषण, पढ़ाई और भविष्य संवार रहे हैं।

अंकिता पटेल

Nagpur Motherly Care for Orphans: 'मदर डे' जहन में आते ही मां का स्नेह और उसकी ममता आंखों के सामने उतर आती है लेकिन कभी आपने सोचा है जिनके जीवन में मां ही नहीं है, उन बच्चों का क्या? जिन बुजुर्गों का घर परिवार ही नहीं, उनकी हालत कैसी होती होगी? ऐसे सवाल मन में उठते हैं लेकिन नागपुर में कुछ ऐसे पुरुष हैं, जिन्होंने खून का रिश्ता न होते हुए भी अनाथ बच्चों के लिए 'मां' की ममता बनकर उन्हें सहारा दिया। कोई उन्हें खाना खिलाता है, तो कोई पढ़ाई करवाता है, तो कोई रात में बुखार आने पर सिर पर हाथ रखकर रातभर जागता है।

'मां' शब्द का उच्चारण होते ही आंखें नम हो जाती हैं। जिन बच्चों ने जन्म से ही मां का साया खो दिया, उनके जीवन में इन पुरुषों ने 'मां' की जगह लेकर यह साबित किया कि 'मातृत्व' दिल से जन्म लेता है। ऐसे ही अनाथ बच्चों के लिए पिछले 30 वर्षों से रामभाऊ इंगोले 'मां' होने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। उमरेड मार्ग स्थित पांचगांव में उकी नवीन देसाई रेजिडेंशियल स्कूल में करीब 80 बच्चे हैं।

साथ ही उमके उदय नगर स्थित निवास में भी दसवीं तक पढ़ाई कर चुके अनेक बच्चे रहते हैं। रामभाऊ ही इन बच्चों की पूरी जिम्मेदारी उठाते हैं और अच्छे से देखभाल करते हैं। इनमें कुछ बच्चे ऐसे हैं जो उन्हें खदानों में मिले।

कुछ बच्चों को अभिभावकों ने छोड़ दिया, तो कुछ पूरी तरह अनाध हैं। इन बच्चों की पढ़ाई पूरी होने के बाद रामभाऊ ने उनका विवाह भी करवाया। संस्था के सचिव संजय इंगोले ने बताया कि इनमें से आज भी कई लड़कियां अपने मायके के लगाव से यहां आती हैं।

जिंदगी से ही मिली प्रेरणा

शहर की 400 झुग्गी बस्तियों के कई बच्चे आज देश के लिए खेल रहे हैं, तो कुछ उच्च शिक्षा प्रात कर रहे हैं। इन बच्चों में नशे की लत खत्म करने के लिए उन्हें खेलों से जोड़ा गया और आगे बढ़ने के लिए शिक्षा की राह दिखाई गई। यह नेक काम सेवा सर्वदा बहुउद्देशीय संस्था के खुशात रामराव ढाक कर रहे है। उनका कहना है कि उन्हें यह प्रेरणा मां गुरु और अपनी जिदगी से मिली। उन्होंने मात्र 1 रुपये शुल्क वाला कॉन्वेंट स्कूल शुरू किया और सड़क पर भीख मांगने बाले बच्चों के लिए सड़क पर ही बुटीक शुरू की अपने इन्हीं प्रयासों से उन्होंने देश की पहली आदिवासी लड़कियों की क्रिकेट टीम तैयार की। साथ ही उन्होंने देश का पहला स्तम महोत्सव भी शुरू किया। इसके अब तक 5 सकल आयोजन हो चुके हैं।

निःस्वार्थ भाव से की सेवा

साथ फाउंडेशन' के संस्थापक प्रयाग संजय डोंगरे भी एक मिसाल है, बचपन में ही पिता का सया उठ गया या लेकिन समाजसेवा की सीख और जज्या पिता से ही मिला। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद प्रयाग संजय डोंगरे की नजर भीख मांगने वाले बच्ची पर पड़ी। जनवरी 2020 में उन्होंने उन बच्ची को स्कूल में दाखिला दिलाया। कोरिड संक्रमणकात में उन्होंने 1200 परिवारों की 'मा जैसों ममता से देखभाल की।

1 जुलाई 2020 को उन्हें 91 वर्षीय एक देवर कुजुर्ग मिले उनके परिवार वाले उन्हें अपनाने को तैयार थे। तभी प्रयाग संजय डोंगरे के मन में कई विचलित कर देने वाले सवाल जहन में आने लगे और उन्होंने पुनर्जन्म आश्रम की शुरुआत की।

आज इस आश्रम में 50 बुजुर्ग नागरिक बिना शुल्क रहते हैं। अब तक 54 लोगों को सुरक्षित उनके घर पहुंबाया जा चुका है। साथ फाउंडेशन' के संस्थापक प्रयाग संजय डोंगरे कहते हैं कि वे बच्चों और बुजुर्गों की मां की तरह देखभाल करते हैं।

-नवभारत लाइव के लिए नागपुर से जयश्री दाणी की रिपोर्ट

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