Indian Railways Security Issues: देश की लाइफलाइन कही जाने वाली भारतीय रेल में यात्रियों के मोबाइल, लैपटॉप व अन्य कीमती सामान व जान की सुरक्षा का जिम्मा 2 अलग-अलग व्यवस्थाओं में बंटा हुआ है।
एक तरफ केंद्र के अधीन रेलवे सुरक्षा बल (RPF) तो दूसरी तरफ राज्य सरकारों के अधीन लोहमार्ग पुलिस (GRP) नतीजा-जिम्मेदारी 2 एजेंसियों की है लेकिन जवाबदेही किसकी ? सबसे बड़ी समस्या यह है कि जिस जीआरपी को रेल अपराधों की जांच और एफआईआर की जिम्मेदारी दी गई है वहां वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों की पोस्टिंग कई राज्यों में लंबी अवधि की रणनीति के बजाय अल्पकालिक तैनाती बनकर रह गई है।
न्यूनतम कार्यकाल तय हो: जीआरपी में तैनात वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों को कम से कम 2 वर्ष का स्थिर कार्यकाल दिया जाए, ताकि वे दीर्घकालिक सुरक्षा योजनाएं लागू कर सकें।
दोनों एजेंसियों की भूमिका स्पष्ट हो किस अपराध में कौन एफआईआर दर्ज करेगा, कौन जांच करेगा और कौन कार्रवाई करेगा, इसकी प्रक्रिया यात्रियों के लिए भी स्पष्ट और सरल हो।।
रेलवे सुरक्षा के लिए विशेष फंड : जीआरपी की रेलवे संबंधी जरूरतों को देखते हुए केंद्र और राज्यों के बीच समन्वित वित्तीय व्यवस्था बनाई जाए, ताकि सीसीटीवी, साइबर इंटेलिजेंस, डेटा एनालिटिक्स और आधुनिक जांच तंत्र को मजबूत किया जा सके।
मध्य रेल जोन के तहत जीआरपी का डिवीजनल हेडक्वार्टर नागपुर के अलावा मुंबई (छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस), पुणे, नागपुर, औरंगाबाद और मुंबई उपनगरीय में स्थित है जहां पुलिस अधीक्षक के तौर पर कमान आईपीएस अधिकारी संभालते हैं।
ऐसे में सवाल सिर्फ अपराध का नहीं, व्यवस्था का है। रेलवे देश की सबसे बड़ी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था है। यहां सुरक्षा केवल आरपीएफ या जीआरपी की जिम्मेदारी नहीं बल्कि केंद्र और राज्यों के बीच प्रभावी समन्वय का विषय है।
जब ट्रेन राज्य की सीमा नहीं मानती तो अपराध की जांच व्यवस्था राज्य की सीमा में क्यों अटके? ऐसे में आईपीएस व्यवस्था एक ब्रिज का काम कर सकती है।
इसमें कोई दोराय नहीं कि जब तक इस सवाल का नीतिगत जवाब नहीं मिलता तब तक रेलवे की पटरियों पर दौड़ती ट्रेनों के साथ 'दोहरी कमान' और 'म्यूजिकल चेयर' की व्यवस्था भी चलती रहेगी।
रेल यात्री सुरक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना यहीं है कि जिसके पास संसाधन है उसके पास हर अपराध की जांच का अधिकार नहीं और जिसके पास जांच का अधिकार है उसके संसाधन और प्राथमिकताएं राज्य व्यवस्था पर निर्भर है।
आरपीएफ के पास आधुनिक उपकरण, सुरक्षा बल और रेलवे परिसरों में व्यापक मौजूदगी है, दूसरी ओर बीएनएस से जुड़े अपराधों में एफआईआर दर्ज करने और जांच की मुख्य जिम्मेदारी जीआरपी की है। रेलवे सुरक्षा बल रेलवे संपत्ति से जुड़े अपराधों पर रेलवे प्रॉपर्टी (अनलॉफुल पोसेशन) एक्ट के तहत कार्रवाई करती है, जबकि जीआरपी राज्य पुलिस कानूनों और प्रक्रियाओं के तहत काम करती है।
दोनों बलो की भूमिका अलग है लेकिन अपराधी और यात्री के लिए रेलवे एक ही है। यही वजह है कि रेलवे सुरक्षा में डेटा शेयरिंग, संयुक्त गश्त, संयुक्त इंटेलिजेंस और त्वरित कार्रवाई के लिए एक स्थायी और स्पष्ट राष्ट्रीय व्यवस्था की जरूरत लंबे समय से महसूस की जाती रही है।
सरकारी रेलवे पुलिस में राज्य कैडर के आईपीएस अधिकारियों (एडीजी, आईजी, डीआईजी और एसपी) को प्रतिनियुक्ति पर भेजा जाता है। अधिकाश राज्यों में आईपीएस अधिकारियों के लिए जीआरपी की तैनाती एक 'सॉफ्ट' या अल्पकालिक पोस्टिंग बनकर रह गई है।
औसतन 8 से 12 महीने में ही एसपी या आईजी स्तर के अधिकारियों का ट्रांसफर मेन पुलिसिंग में कर दिया जाता है। रेलवे अपराधियों का नेटवर्क किसी एक जिले या राज्य तक सीमित नहीं रहता। ट्रेन एक दिन में कई राज्यों को पार करती है।
अपराची भी इसी नेटवर्क का फायदा उठाते हैं। इस 'म्यूजिकल चेयर' खेल का नतीजा यह है कि जब तक कोई अधिकारी रेलवे के जटिल नेटवर्क, अंतरराज्यीय आपराधिक गिरोहों के तरीके और आरपीएफ के साथ समन्वय को समझ पाता है, तब तक उस जगह नया चेहरा आ जाता है,
सतीश दंडारे नवभारत।