अवैध रेत उत्खनन, रेत माफिया, नागपुर, (सोर्स: सौजन्य AI) 
नागपुर

एक रॉयल्टी पर 4 चक्कर! नागपुर के रेत घाटों पर बड़ा खेल उजागर; प्रशासन की भूमिका पर सवाल

Nagpur Illegal Sand Mining: नागपुर जिले के कई रेत घाटों पर एक ही रॉयल्टी पर बार-बार रेत परिवहन किए जाने के आरोप हैं। इससे राजस्व नुकसान के साथ पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन की भी शिकायतें बढ़ी हैं।

अंकिता पटेल

Nagpur Sand Mafia: नागपुर जिले के नीलाम किए गए कई रेत घाटों पर नियमों को ताक पर रखकर अवैध रेत उत्खनन और परिवहन का बड़ा गोरखधंधा चल रहा है। एक ही रॉयल्टी पर 3 से 4 बार रेत की ढुलाई किए जाने से शासन को करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है। वहीं पर्यावरणीय नियमों का भी खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है। डिमार्केशन (सीमांकन) अनिवार्य होने के बावजूद एक भी घाट पर यह दिखाई नहीं देता।

जानकारी के अनुसार, रात 9 से सुबह 6 बजे तक ट्रैक्टरों के माध्यम से बड़े पैमाने पर अवैध रेत परिवहन किया जाता है। सूत्रों के अनुसार नदी के किनारों से निकाली गई रेत को घाट से लगभग एक से डेढ़ किलोमीटर दूर डंप किया जाता है। इसके बाद जेसीबी की सहायता से उसे टिप्परों में भरकर विभिन्न स्थानों पर भेजा जाता है। कई बार कारंजा, बुलढाना जैसे दूरस्थ क्षेत्रों के लिए रॉयल्टी निकाली जाती है लेकिन वास्तव में उसी रॉयल्टी के आधार पर नागपुर जैसे शहर में 14 से 16 घंटे की अवधि में 3 से 4 चक्कर लगाए जाते हैं।

झाड़ियों में डम्प हो रही रेत

घाटों के आसपास मौजूद जेसीबी मशीनों के बारे में पूछताछ करने पर बताया जाता है कि उन्हें खेत या नाले के कार्यों के लिए लाया गया है। मुख्य रूप से झाड़ियों वाले क्षेत्रों में रेत डम्प की जाती है। इसके अलावा रेत परिवहन में निर्धारित क्षमता से अधिक माल भरकर ले जाने का काम भी धड़ल्ले से जारी है। सूत्रों ने बताया कि सामान्यतः 10 पहियों वाले टिप्पर के लिए 3 ब्रास रेत की रॉयल्टी निकाली जाती है लेकिन वास्तव में टिप्पर पर ऊंची रिप लगाकर उसमें लगभग 5 ब्रास यानी करीब 500 घनफुट रेत भरी जा रही है। इससे एक ही रॉयल्टी पर अधिक मात्रा में रेत परिवहन कर शासन को चूना लगाया जा रहा है।

सीमारेखा बताने का कोई संकेतक नहीं

इस बीच, कई नीलाम घाटों पर स्वीकृत क्षेत्र की सीमा से बाहर जाकर नदी के किनारों से रेत उत्खनन किए जाने की बात भी सामने आई है। नियमों के अनुसार घाटों का स्पष्ट डिमार्केशन करना आवश्यक होता है। लेकिन अधिकांश स्थानों पर सीमारेखा दर्शाने वाले कोई संकेतक या खंभे दिखाई नहीं देते। इससे वास्तव में किस क्षेत्र से रेत निकाली जा रही है, इस पर नियंत्रण नहीं रह पाता। अवैध उत्खनन, अतिरिक्त परिवहन, नियमों के विपरीत खुदाई और निगरानी तंत्र की कमी के कारण रेत घाटों का कामकाज एक बार फिर चर्चा में आ गया है। राजस्व और पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से प्रशासन द्वारा तत्काल कड़ी कार्रवाई किए जाने की मांग की जा रही है।

तंत्र की हो रही अनदेखी ?

  • कई घाटों पर डिमार्केशन का कोई निशान नहीं है।
  • अधिकांश स्थानों पर सीसीटीवी व्यवस्था चालू नहीं है।
  • पर डे डंपिग पुस्तिका उपलब्ध नहीं होने की शिकायत।
  • तहसील कार्यालय द्वारा रिकॉर्ड का नियमित परीक्षण नहीं किए जाने का आरोप।
  • रात के समय अवैध परिवहन रोकने के लिए प्रभावी निगरानी का अभाव।

क्या कहते हैं नियम, क्या अनिवार्य ?

  • रेत उत्खनन कैवल सुबह 6 से शाम 6 बजे तक ही किया जा सकता है
  • नदी के किनारों में 3 मीटर से अधिक खुदाई नहीं की जा सकती।
  • घाटों का स्पष्ट डिमार्केशन करना अनिवार्य है।
  • प्रत्येक घाट पर सीसीटीवी कैमरे लगाना आवश्यक है।
  • उत्खनन और परिवहन का दैनिक रिकॉर्ड रखना अनिवार्य है।

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