Nagpur High Court Thakur ST Caste Certificate: नागपुर हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए शिंदे परिवार के 3 सदस्यों के पक्ष में फैसला देते हुए उन्हें 'ठाकुर' अनुसूचित जनजाति (एसटी) का प्रमाण पत्र जारी करने का आदेश दिया है। हाई कोर्ट ने अनुसूचित जनजाति जाति प्रमाण पत्र स्क्रूटनी कमेटी के 26 अगस्त 2025 के उस आदेश को पूरी तरह से रद्द कर दिया है, जिसमें याचिकाकर्ताओं के दावों को अमान्य कर दिया गया था।
जाति प्रमाणपत्र का दावा ठुकराए जाने के बाद इसे चुनौती देते हुए निकिता शिंदे, विवेकानंद शिंदे और अनंत शिंदे द्वारा हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई। इन सभी ने उप विभागीय अधिकारी, वाशिम से प्राप्त अपने जाति प्रमाण पत्रों को सत्यापन के लिए स्क्रूटनी कमेटी के पास भेजा था। पुलिस विजिलेंस सेल की जांच के बाद स्क्रूटनी कमेटी ने यह कहते हुए उनके दावे को खारिज कर दिया था कि याचिकाकर्ता 'एफिनिटी टेस्ट' पास करने में विफल रहे हैं और उनकी संस्कृति 'ठाकुर' समुदाय से मेल नहीं खाती है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील ने 1934 और 1936 के स्वतंत्रता पूर्व के ठोस दस्तावेज पेश किए। वंशावली के अनुसार याचिकाकर्ताओं के परदादा यशवंत के बेटे काशीनाथ (जन्म 31 जनवरी 1934) और राजाराम (जन्म 3 दिसंबर 1936) के जन्म और स्कूल रिकॉर्ड में उनकी जाति 'ठाकुर' दर्ज पाई गई। कोर्ट ने माना कि स्वतंत्रता पूर्व के दस्तावेजों का साक्ष्य के रूप में बहुत अधिक मूल्य होता है, जिन्हें आधार बनाकर दावों की पुष्टि की जानी चाहिए।
अदालत के सामने यह तथ्य भी रखा गया कि याचिकाकर्ताओं के एक चचेरे चाचा, गजानन भानुदास शिंदे को हाई कोर्ट के ही 19 जुलाई 2024 के एक आदेश के आधार पर पहले ही जाति वैधता प्रमाण पत्र मिल चुका है।
कोर्ट ने 'अपूर्वा विनय निचाले' मामले (2010) का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि जब किसी उम्मीदवार के रक्त संबंधी को समान जाति का वैधता प्रमाण पत्र पहले ही मिल चुका हो और उसमें कोई धोखाधड़ी न हुई हो, तो कमेटी परिवार के अन्य सदस्यों के दावे को खारिज नहीं कर सकती।
स्क्रूटनी कमेटी द्वारा एफिनिटी टेस्ट को आधार बनाकर दावे को खारिज करने पर न्यायालय ने सख्त रुख अपनाया। सुप्रीम कोर्ट के 'आनंद बनाम स्क्रूटनी कमेटी' (2012) और 'महाराष्ट्र आदिवासी ठाकुर जमात संरक्षण समिति' (2023) केस का संदर्भ देते हुए अदालत ने कहा कि 'एफिनिटी टेस्ट' अनुसूचित जनजाति का दावा तय करने के लिए कोई 'लिटमस टेस्ट' या एकमात्र मापदंड नहीं हो सकता।
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केवल इसलिए कि वर्तमान में उम्मीदवार के रीति-रिवाज, पूजा-पाठ या मृत्यु संस्कार प्राचीन जनजाति के विशिष्ट लक्षणों से पूरी तरह मेल नहीं खाते, उनके अधिकारों को छीना नहीं जा सकता। इसके बाद हाई कोर्ट ने उक्त आदेश जारी किया।